Bihar Chunav: पारिवारिक दलों में विरासत की तकरार, आखिर कब थमेगी राजनीतिक वंशवाद की रफ्तार? पढ़िए

Bihar Chunav: देश की राजनीति में परिवार-केंद्रित दलों की लंबी कतार है, लेकिन इन पार्टियों का ‘प्राइवेट लिमिटेड’ कंपनियों की तरह चलना अब सार्वजनिक विवादों का केंद्र बन गया है। जब इन दलों के संस्थापक और सर्वमान्य मुखिया कमजोर पड़ने लगते हैं, तो सत्ता, संपत्ति और उत्तराधिकार को लेकर पार्टी के भीतर ही महाभारत छिड़ जाती है। यह संकट न केवल पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल उठाता है, बल्कि चुनावी माहौल को भी प्रभावित करता है।
हाल के दिनों में बिहार के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से लेकर तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) तक, कई बड़े क्षेत्रीय दलों में विरासत की यह तकरार खुलकर सामने आई है, जिसने भारतीय राजनीति की इस ‘वंशवादी’ परंपरा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
सत्ता का असली केंद्र एक परिवार तक ही सीमित
दरअसल, भारतीय राजनीति की यह कड़वी सच्चाई है कि ये दल बाहरी दुनिया के लिए भले ही संसदीय परंपराओं और चुनावी कानूनों का दिखावा करते हों, लेकिन हकीकत में सत्ता का असली केंद्र एक परिवार तक ही सीमित रहता है। संस्थापक के हाथ से सत्ता फिसलते ही, वारिसों के बीच ‘अपनी-अपनी दावेदारी’ की जंग छिड़ जाती है। वोटर भले ही निजी जीवन में भारतीय परंपरा निभाए, पर राजनीतिक उत्तराधिकारी वह उसी को स्वीकार करता है, जिसे मुखिया ने चुना हो, जैसा कि अखिलेश यादव और एमके स्टालिन के मामले में देखा गया है। मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रमों को देखते हुए, यह सवाल उठना लाज़मी है कि इस विरासत की तकरार पर लगाम कब लगेगी?
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राजद में तेजप्रताप-तेजस्वी की खींचतान
बिहार विधानसभा चुनाव की दस्तक के साथ ही लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद इन दिनों गहरे पारिवारिक संकट से गुजर रही है। स्वास्थ्य कारणों से लालू प्रसाद की सक्रियता कम होने के कारण यह उत्तराधिकार की लड़ाई खुलकर सामने आ गई है। भारतीय परंपरा के विपरीत, लालू के छोटे बेटे तेजस्वी यादव को पार्टी ने नेता के तौर पर स्वीकार कर लिया है, जबकि बड़े बेटे तेजप्रताप यादव को हाल ही में राजद से निष्कासित कर दिया गया है। इसके जवाब में उन्होंने ‘जनशक्ति जनता दल’ के नाम से अपना अलग दल बना लिया है।
कभी समर्थन तो कभी निशाना
तेजप्रताप की बहन रोहिणी आचार्य भी कभी उनका समर्थन करती दिखती हैं, तो कभी परोक्ष रूप से तेजस्वी पर निशाना साधती नज़र आती हैं। सत्ता की इस खींचतान के पीछे तेजस्वी के करीबी और राज्यसभा सदस्य, हरियाणा मूल के संजय यादव को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। हालांकि, पार्टी में पारिवारिक हिस्सेदारी को साधने के प्रयास पूर्व में भी दिखे हैं; पिछले लोकसभा चुनाव में रोहिणी आचार्य को सारण और मीसा भारती को पाटलिपुत्र से टिकट मिला था। मीसा भारती चुनाव जीतने में कामयाब रहीं, लेकिन उनकी चुप्पी और दबी हुई नाराज़गी भी समय-समय पर सतह पर आती रही है।
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तेलंगाना से तमिलनाडु तक
राजद अकेला ऐसा दल नहीं है जो इस तरह के आंतरिक विवादों से जूझ रहा है। परिवार-केंद्रित पार्टियों में ऐसा संकट आम है।भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस), तेलंगाना: दस साल तक सत्ता में रही इस पार्टी में संस्थापक के. चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता को पार्टी से निलंबित कर दिया गया है। उनका तालमेल उत्तराधिकारी माने जा रहे भाई केटी रामाराव से नहीं बैठ रहा।वाईएसआर कांग्रेस, आंध्र प्रदेश: मुख्यमंत्री रहे जगन मोहन रेड्डी के खिलाफ उनकी बहन वाईएस शर्मिला ने मोर्चा खोल रखा है। संपत्ति और सत्ता में हिस्सेदारी इस पारिवारिक विवाद की मुख्य वजह है।
डीएमके, तमिलनाडु: करुणानिधि ने अपने छोटे बेटे एमके स्टालिन को स्थापित किया था, लेकिन दूसरे बेटे एमके अलागिरी को यह सरपरस्ती स्वीकार्य नहीं थी, जिससे परिवार में सत्ता की लड़ाई जारी रही। हाल ही में करुणानिधि के भतीजे मुरासोली मारन के बेटों कलानिधि मारन और दयानिधि मारन के बीच संपत्ति का विवाद राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बना था।
अतीत के पन्नों में उत्तराधिकार की जंग
- इस तरह की पारिवारिक जंग का इतिहास पुराना है और कई प्रमुख क्षेत्रीय दलों को खंड-खंड कर चुका है। सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के स्वाभाविक उत्तराधिकारी शिवपाल यादव माने जाते थे, लेकिन 2012 में सत्ता बेटे अखिलेश यादव को मिली।
- इसके बाद उत्तराधिकार की जंग चली, जो तभी थमी जब शिवपाल ने भतीजे की सरपरस्ती स्वीकार कर ली। चौटाला परिवार तो राजनीतिक उत्तराधिकार की लड़ाई में खंड-खंड हो चुका है।
- बाला साहब ठाकरे के स्वाभाविक उत्तराधिकारी राज ठाकरे माने जा रहे थे, लेकिन जब उत्तराधिकार सौंपने की बारी आई, तो उन्होंने बेटे उद्धव ठाकरे पर भरोसा किया, जिसके बाद शिवसेना में भी उत्तराधिकार की जंग छिड़ गई थी।
वोटर किसे करेगा स्वीकार?
“दरअसल पारिवारिक पार्टियों में उत्तराधिकार की लड़ाई तब छिड़ती है, जब पार्टी का संस्थापक कमजोर हो जाता है और सत्ता उसके हाथ से फिसल चुकी होती है। वोटर भले ही अपने पारिवारिक स्तर पर भारतीय परंपरा को निभाता हो, लेकिन वह उसे ही राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार करता है, जिसे राजनीतिक परिवार का मुखिया अपना उत्तराधिकारी घोषित करता है।”
एमके स्टालिन और अखिलेश यादव इसके स्पष्ट उदाहरण हैं, जिन्हें मुखिया द्वारा घोषित किए जाने पर जनता ने स्वीकार किया। अब देखना यह होगा कि बिहार की जनता इस रवायत को कायम रखती है या कोई नया फैसला लेती है। हालांकि, तेजप्रताप और रोहिणी के बागी तेवरों से राजद के चुनावी नतीजों पर गहरा असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

