Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary: How India Fooled CIA During Pokhran Nuclear Tests in 1998 (pic-x)
Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary: भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण की वह कहानी एक बार फिर चर्चा में है, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया था। भारत ने बेहद गोपनीय तरीके से परमाणु परीक्षण की तैयारी की और अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA की कड़ी निगरानी के बावजूद मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। इस पूरे अभियान में राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक रणनीति और सैन्य अनुशासन (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) की अहम भूमिका रही।
11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में हुए परमाणु परीक्षणों के बाद प्रधानमंत्री वाजपेयी ने दुनिया के सामने भारत की परमाणु क्षमता का ऐलान किया। खास बात यह थी कि परीक्षण की तैयारियों की भनक अमेरिकी खुफिया तंत्र को पहले से नहीं लग सकी। इस मिशन की गोपनीयता बनाए रखने के लिए वैज्ञानिकों की पहचान छिपाने से लेकर रात में काम करने (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) और सैटेलाइट की निगरानी से बचने तक कई रणनीतियां अपनाई गईं।
1995 की नाकामी से भारत ने लिया सबक
भारत ने 1974 में पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था, जिसे ‘स्माइलिंग बुद्धा’ नाम दिया गया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते लंबे समय तक भारत ने दूसरा परमाणु परीक्षण नहीं किया। 1995 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में परीक्षण की तैयारी शुरू हुई, लेकिन अमेरिकी सैटेलाइट ने पोखरण में हो रही गतिविधियों को पकड़ लिया। इसके बाद अमेरिका की ओर से कूटनीतिक दबाव बढ़ा और भारत को योजना रोकनी पड़ी। इस घटना ने भारतीय रणनीतिक और वैज्ञानिक तंत्र को यह समझा दिया कि अगली बार परीक्षण की तैयारी बेहद गोपनीय (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) तरीके से करनी होगी।
वाजपेयी ने वैज्ञानिकों को दी हरी झंडी
मार्च 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी। इसके कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिकों और सैन्य अधिकारियों के साथ गोपनीय बैठक की। इस बैठक में परमाणु ऊर्जा आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. आर. चिदंबरम और डीआरडीओ प्रमुख डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम समेत वरिष्ठ वैज्ञानिक शामिल थे। वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण की तैयारियों को आगे बढ़ाने की अनुमति दी। राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए मिशन की जानकारी बेहद (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) सीमित लोगों तक रखी गई।
सैटेलाइट की निगरानी से बचने की रणनीति
उस समय अमेरिकी खुफिया एजेंसी के सैटेलाइट पोखरण पर लगातार नजर रखते थे। ऐसे में भारतीय वैज्ञानिकों और सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि परीक्षण की तैयारियों का कोई संकेत अंतरिक्ष से दिखाई न दे। रिपोर्टों के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट के ऑर्बिट और उनके गुजरने के समय का अध्ययन किया। इसके आधार पर ऐसे समय का इस्तेमाल किया गया जब पोखरण क्षेत्र सीधे निगरानी में नहीं होता था। संवेदनशील गतिविधियों को इसी अंतराल में पूरा करने की रणनीति (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) बनाई गई।
सेना की वर्दी में नजर आए वैज्ञानिक
मिशन की गोपनीयता बनाए रखने के लिए वैज्ञानिकों की पहचान छिपाने के भी प्रयास किए गए। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और डॉ. आर. चिदंबरम जैसे वरिष्ठ वैज्ञानिकों को सेना की वर्दी में रखा गया, ताकि उनकी मौजूदगी सामान्य सैन्य गतिविधि जैसी लगे। वैज्ञानिकों के लिए कोड नामों के इस्तेमाल की बात भी सामने आती है। इसका मकसद संवेदनशील बातचीत (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) के दौरान उनकी वास्तविक पहचान को उजागर होने से बचाना था।
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रात के अंधेरे में चलता था काम
पोखरण में परीक्षण से जुड़ा ज्यादातर संवेदनशील काम रात के समय किया गया। भूमिगत शाफ्ट तैयार करने, तार बिछाने और उपकरणों को निर्धारित स्थान तक पहुंचाने जैसे कामों को इस तरह अंजाम दिया गया कि दिन में इलाके की गतिविधियां सामान्य नजर आएं। रेगिस्तानी इलाके में मौजूद प्राकृतिक परिस्थितियों का भी फायदा उठाया गया। रेत के बीच वाहनों के निशान और निर्माण (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) गतिविधियों को छिपाने के लिए सावधानी बरती गई।
परमाणु उपकरणों को पहुंचाया गया गुप्त तरीके से
परमाणु परीक्षण के लिए जरूरी संवेदनशील सामग्री और उपकरणों को पोखरण तक पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण था। इन सामानों को सामान्य सैन्य रसद की तरह ले जाने और सतह पर उनकी मौजूदगी के संकेत कम से कम रखने की कोशिश की गई। उपकरणों को भूमिगत शाफ्ट तक पहुंचाने के बाद उन्हें सतह से छिपाकर रखा गया, ताकि निगरानी करने वालों को (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) किसी असामान्य गतिविधि का अंदाजा न हो।
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फोन और संचार पर भी रखी गई सख्त पाबंदी
मिशन की गोपनीयता केवल सैटेलाइट से बचने तक सीमित नहीं थी। संवेदनशील जानकारी के इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से लीक होने का खतरा भी था। इसलिए परीक्षण से जुड़े लोगों के बीच जानकारी साझा करने के लिए बेहद सीमित संचार व्यवस्था अपनाई गई। मिशन में शामिल लोगों को जरूरी जानकारी ही दी जाती थी, जबकि व्यापक स्तर पर सूचना (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) का दायरा बेहद छोटा रखा गया।
11 मई 1998 को हुआ बड़ा ऐलान
आखिरकार 11 मई 1998 को पोखरण में तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए गए। परीक्षणों के बाद भारत ने दुनिया को अपनी परमाणु क्षमता का संदेश दिया। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में परीक्षणों की सफलता की घोषणा की। इसके दो दिन बाद 13 मई 1998 को दो और परमाणु परीक्षण किए गए। इन परीक्षणों के साथ भारत ने खुद को (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया।
दुनिया को लगी भारत की रणनीति की भनक
पोखरण परीक्षणों की सफलता के बाद अमेरिका समेत कई देशों को भारत के परमाणु कार्यक्रम की गोपनीयता और तैयारियों पर सवाल उठाने पड़े। अमेरिकी खुफिया तंत्र की निगरानी के बावजूद भारत के मिशन को अंतिम समय तक गुप्त रखना इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना गया। पोखरण-II ने भारत की रणनीतिक क्षमता, वैज्ञानिक कौशल और राजनीतिक इच्छाशक्ति को दुनिया के सामने मजबूती से स्थापित किया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में हुए (Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary) इस मिशन को आज भी भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक अभियानों में गिना जाता है।

