Why Did Pervez Musharraf Not Salute Atal Bihari Vajpayee? Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story
Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story: क्या आपने कभी सोचा है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर पहुंचे थे, तब पाकिस्तान के दो सैन्य प्रमुखों ने उन्हें सलामी दी, लेकिन जनरल परवेज मुशर्रफ ने सलामी देने के बजाय उनसे हाथ क्यों मिलाया था? क्या यह सिर्फ सैन्य प्रोटोकॉल का मामला था या इसके पीछे कारगिल युद्ध से जुड़ी कोई बड़ी कहानी छिपी थी?
नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ने इस पुराने सवाल को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। कारगिल युद्ध पर बनी यह सीरीज पहली बार इस संघर्ष को भारतीय वायुसेना के नजरिए से दिखाती है। लेकिन सीरीज में दिखाई गई कहानी और इतिहास में दर्ज घटनाओं में कितना अंतर है, (Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story) आइए समझते हैं।
लाहौर में क्या हुआ था?
तारीख थी 21 फरवरी 1999। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में नई शुरुआत की उम्मीद के बीच प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर पहुंचे थे। लाहौर के गवर्नर हाउस में उन्होंने अपने संबोधन का समापन कविता के साथ किया। इसके बाद पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों से मुलाकात का वक्त आया। सबसे पहले नेवी चीफ एडमिरल फ़सीह बुख़ारी ने वाजपेयी (Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story) को सलामी दी।
इसके बाद एयर चीफ़ मार्शल परवेज मेहंदी क़ुरैशी ने भी उन्हें सलामी दी। फिर सामने आए पाकिस्तान के थल सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ। सीरीज में दिखाया गया है कि मुशर्रफ कुछ पल के लिए रुके और सलामी देने के बजाय वाजपेयी (Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story) की तरफ हाथ बढ़ा दिया।
मुशर्रफ ने सलामी क्यों नहीं दी?
इस घटना को लेकर पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर ने अलग वजह बताई थी। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘चूँकि पाकिस्तान के एयरफ़ोर्स चीफ़ और नेवी चीफ़ ने उस वक्त वर्दी और कैप पहनी थी. इसकी वजह से उन्होंने वाजपेयी जी को सैल्यूट किया लेकिन जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने वर्दी तो पहनी थी लेकिन कैप नहीं लगाई थी. इसकी वजह से उन्होंने सैल्यूट करने की बजाय हाथ मिलाया.’ यानी संभव है कि मुशर्रफ का हाथ मिलाना किसी राजनीतिक अपमान का (Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story) संकेत नहीं, बल्कि सैन्य प्रोटोकॉल से जुड़ा मामला रहा हो। हालांकि इस घटना की दूसरी व्याख्याएं भी सामने आती रही हैं।

सीरीज में इस सीन को इतना अहम क्यों बनाया गया?
‘ऑपरेशन सफेद सागर’ के लेखक संदीप जैन ने बताया कि मुशर्रफ के व्यक्तित्व को समझाने के लिए इस दृश्य को खास तरीके से तैयार किया गया था। उन्होंने कहा, ‘दर्शकों को हम मुशर्रफ़ का व्यक्तित्व दिखाना चाहते थे. वह स्क्रीनप्ले ही ऐसा माध्यम था जिसके ज़रिए दर्शक महसूस कर सकें कि उस दौरान मुशर्रफ़ के दिमाग़ में क्या चल रहा था.’ संदीप जैन के मुताबिक, ‘असल में वाजपेयी के लाहौर पहुंचने से पहले ही मुशर्रफ़ कारगिल युद्ध की पूरी प्लानिंग कर चुके थे. ऐसे में स्क्रीनप्ले ही वो जरिया था जिससे दिखाया जा सके कि (Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story) दरअसल मुशर्रफ खुद को भारत के प्रधानमंत्री से कम नहीं समझते थे.’
कारगिल में सेना और वायुसेना के बीच मतभेद
सीरीज में सेना और वायुसेना को तेजी से साथ काम करते दिखाया गया है, लेकिन असल हालात इतने आसान नहीं थे। तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एवाई टिपनिस के मुताबिक, मई 1999 में दोनों सेनाओं के बीच गंभीर मतभेद थे और संयुक्त योजना की कमी थी। आखिरकार 25 मई को वाजपेयी सरकार से मंजूरी मिलने के बाद 26 मई से वायुसेना ने ऑपरेशन शुरू किया। 28 मई को एक एमआई-17 हेलिकॉप्टर स्टिंगर मिसाइल की चपेट में आ गया, जिसमें चार वायुसैनिकों की (Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story) मौत हुई।
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अजय आहूजा और ‘गोल्डन ऐरोज’ की कहानी
कारगिल युद्ध में 17वीं स्क्वाड्रन ‘गोल्डन ऐरोज’ की भी अहम भूमिका रही। इसका शुरुआती काम दुश्मन के ठिकानों की तस्वीरें लेना और टोही करना था। बाद में इसे बमबारी की भूमिका भी दी गई। इसी दौरान स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा ने लेफ्टिनेंट के. नचिकेता के दुर्घटनाग्रस्त विमान की तलाश में उड़ान भरी। पाकिस्तानी सैनिकों ने उनके विमान को मिसाइल से निशाना बनाया।
विमान गिरने के बाद उन्होंने इजेक्ट किया, लेकिन भारत के आधिकारिक पोस्टमॉर्टम के मुताबिक जमीन पर उतरने के बाद उन्हें गोली मार दी गई। एवाई टिपनिस ने लिखा, ‘इजेक्शन सीट ने उन्हें दूसरी ज़िंदगी दे दी थी, पर दुश्मन की बर्बरता से बचने के लिए तीसरी (Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story) चाहिए थी’।

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कारगिल युद्ध की असली कहानी
मई 1999 में पाकिस्तानी सैनिकों की घुसपैठ के बाद कारगिल युद्ध शुरू हुआ। भारतीय सेना ने बेहद कठिन पहाड़ी परिस्थितियों में लड़ते हुए दुश्मन की चोटियों पर कब्जा वापस हासिल किया। इस युद्ध में भारत के 527 सैनिक शहीद हुए और 1363 जवान घायल हुए। भारतीय वायुसेना और बोफोर्स तोपों ने पाकिस्तानी ठिकानों पर लगातार (Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story) हमले किए।
‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ने कारगिल युद्ध के इन्हीं अनदेखे पहलुओं को दोबारा चर्चा में ला दिया है। मुशर्रफ का वाजपेयी से हाथ मिलाना हो या अजय आहूजा की शहादत-हर घटना के पीछे इतिहास की कई परतें हैं। सबसे बड़ा सवाल आज भी यही है-क्या कारगिल की पटकथा 1999 में लिखी गई थी, या उसकी तैयारी वाजपेयी के लाहौर दौरे (Operation Safed Sagar Reveals Kargil War Story) से भी पहले शुरू हो चुकी थी?

