Vishwanath and Sons Review: Suriya's New Movie Review, Story, Acting and Rating
Vishwanath and Sons Review: सूर्या एक बार फिर बड़े पर्दे पर लौट आए हैं। तीन महीने पहले ‘करुप्पु’ यानी तेलुगु में ‘वीरभद्र’ के जरिए दर्शकों का मनोरंजन करने के बाद अब वह ‘विश्वनाथ एंड सन्स’ में नजर आ रहे हैं। फिल्म की कहानी परिवार, रिश्तों और मां-बेटे के भावनात्मक रिश्ते के इर्द-गिर्द बुनी गई है।
फिल्म का निर्देशन तेलुगु सिनेमा के चर्चित निर्देशक वेंकी अटलूरी ने किया है, जबकि नागवंशी ने इसका निर्माण किया है। ममिता बैजू फिल्म में सूर्या के साथ मुख्य भूमिका में हैं। राधिका और रवीना टंडन भी अहम किरदारों में नजर आती हैं। तमिल और तेलुगु भाषा में रिलीज हुई यह फिल्म कितनी असरदार है और क्या इसे देखने के लिए थिएटर (Vishwanath and Sons Review) का रुख करना चाहिए, आइए जानते हैं।
क्या है ‘विश्वनाथ एंड सन्स’ की कहानी?
फिल्म की कहानी संजय विश्वनाथ यानी सूर्या के किरदार से शुरू होती है। संजय एक सफल कारोबारी होने के साथ-साथ ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीत चुका शानदार शूटर है। 40 साल की उम्र पार करने के बावजूद संजय शादी से दूर रहता है। वह अमेरिका जाकर सरोगेसी के जरिए एक बेटे का पिता बनता है और फिर अपने बच्चे के साथ भारत (Vishwanath and Sons Review) लौट आता है।
समय बीतता है और संजय के बेटे को एक दुर्लभ बीमारी हो जाती है। उसकी जान बचाने के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। इसके लिए बच्चे को जन्म देने वाली सरोगेट मां की जरूरत सामने आती है। इसके बाद संजय अमेरिका जाता है और अपने बेटे को जन्म देने वाली सरोगेट मदर मैडी यानी ममिता बैजू को ढूंढकर भारत ले आता है।
मैडी की उम्र महज 20 साल है। संजय पहले ही तय कर चुका होता है कि बच्चे की सर्जरी के बाद मैडी वापस अमेरिका चली जाएगी। लेकिन उसके भारत आने के बाद संजय और उसके परिवार की जिंदगी में कई ऐसे बदलाव (Vishwanath and Sons Review) आते हैं, जिनकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
संजय शादी से क्यों भागता है?
फिल्म की कहानी सिर्फ बच्चे की बीमारी या सरोगेसी तक सीमित नहीं रहती। इसके साथ संजय के अतीत और उसके शादी से दूर रहने की वजह को भी जोड़ा गया है। मैडी के आने के बाद दोनों के बीच कई मजेदार और भावुक परिस्थितियां पैदा होती हैं। मैडी संजय की जिंदगी में प्यार और अपनापन लेकर आती है, लेकिन संजय उसके प्यार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता।
फिल्म इसी सवाल के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है कि आखिर संजय शादी से क्यों बचता रहा? क्या वह अकेले अपने बेटे की परवरिश कर सकता है? और क्या मैडी उसके परिवार का हिस्सा बन (Vishwanath and Sons Review) पाएगी?
कहानी में कॉमेडी और इमोशन का अच्छा संतुलन
‘विश्वनाथ एंड सन्स’ की सबसे बड़ी खासियत इसका पारिवारिक कलेवर है। फिल्म में रिश्तों, परंपराओं और मां-बेटे के भावनात्मक जुड़ाव को प्रमुखता दी गई है। कहानी का मूल विचार भले ही नया न लगे, लेकिन निर्देशक वेंकी अटलूरी ने इसके आसपास के किरदारों और घटनाओं को दिलचस्प तरीके से पेश किया है। फिल्म कई जगह दर्शकों को हंसाती है तो कुछ सीन भावुक भी कर देते हैं। खासतौर पर मैडी के भारत आने के बाद कहानी में कॉमेडी का (Vishwanath and Sons Review) रंग बढ़ जाता है।
इंटरवल के बाद बढ़ती है दिलचस्पी
फिल्म की शुरुआत संजय के ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतने वाले दृश्य से होती है। इसके बाद उसके परिवार और कारोबारी सफर को दिखाया जाता है। बच्चे के लिए सरोगेसी का फैसला कहानी को आगे बढ़ाता है। मैडी के भारत पहुंचने के बाद फिल्म का माहौल पूरी तरह बदल जाता है।
मैडी की शरारतें और उसका बेबाक अंदाज थिएटर में हंसी का माहौल बनाते हैं। वहीं मां से जुड़े भावनात्मक दृश्य कहानी को गंभीर बनाते हैं। इंटरवल का मोड़ दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाता है और यह जानने की दिलचस्पी (Vishwanath and Sons Review) पैदा करता है कि कहानी आगे किस दिशा में जाएगी।
सेकेंड हाफ में इमोशन का जोर
दूसरे भाग में फिल्म काफी हद तक मनोरंजन के साथ आगे बढ़ती है। मां से जुड़ा एक अहम ट्रैक कहानी का सबसे भावुक हिस्सा बन जाता है। एक टीवी शो वाला एपिसोड भी प्रभाव छोड़ता है। खासतौर पर जब पर्दे पर सूर्या का किरदार भावुक होता है, तो वह दृश्य दर्शकों को भी भावनात्मक रूप से जोड़ने में कामयाब होता है। हालांकि इसके बाद कहानी की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ती है। शादी वाला हिस्सा कुछ जगह खिंचा हुआ महसूस होता है और क्लाइमैक्स भी बहुत ज्यादा चौंकाने (Vishwanath and Sons Review) वाला नहीं है।
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सूर्या की एक्टिंग कैसी है?
संजय विश्वनाथ के किरदार में सूर्या पूरी तरह फिट नजर आते हैं। वह किरदार की गंभीरता और भावनात्मक पहलू को बखूबी निभाते हैं। खासकर भावुक दृश्यों में सूर्या की अदाकारी फिल्म की ताकत बनकर सामने आती है। उनके चेहरे के भाव और संवाद अदायगी कई दृश्यों को प्रभावी बना देते हैं।
ममिता बैजू को भी फिल्म में अच्छा रोल मिला है। मैडी के किरदार में उनका चुलबुलापन और शरारती अंदाज दर्शकों को पसंद आ सकता है।राधिका ने मां के किरदार में शानदार काम किया है। रवीना टंडन समेत बाकी कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं (Vishwanath and Sons Review) के साथ न्याय किया है।
तकनीकी पक्ष कैसा है?
फिल्म का संगीत इसकी खासियतों में शामिल है। कहानी के भावनात्मक पलों के साथ संगीत अच्छी तरह मेल खाता है। सिनेमैटोग्राफी भी शानदार है। फिल्म के ज्यादातर दृश्य बड़े पर्दे पर भव्य नजर आते हैं और प्रोडक्शन वैल्यू साफ दिखाई देती है। हालांकि एडिटिंग में थोड़ी और कसावट की जरूरत महसूस होती है। खासकर दूसरे भाग के कुछ दृश्यों को छोटा किया (Vishwanath and Sons Review) जाता तो फिल्म की रफ्तार और बेहतर हो सकती थी।
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कैसी है ‘विश्वनाथ एंड सन्स’?
कुल मिलाकर ‘विश्वनाथ एंड सन्स’ एक भावनात्मक पारिवारिक मनोरंजन फिल्म है। कहानी का मूल आधार भले ही पूरी तरह नया नहीं है, लेकिन रिश्तों, कॉमेडी और इमोशन को मिलाकर इसे देखने लायक बनाया गया है। सूर्या की शानदार अदाकारी, ममिता बैजू का चुलबुला किरदार, राधिका का भावनात्मक अभिनय और खूबसूरत सिनेमैटोग्राफी फिल्म के मजबूत पक्ष हैं।
अगर आपको परिवार और रिश्तों पर आधारित हल्की-फुल्की लेकिन भावुक फिल्में पसंद हैं, तो ‘विश्वनाथ एंड सन्स’ आपके लिए अच्छा विकल्प हो सकती है। हालांकि दूसरे भाग में थोड़ी धीमी रफ्तार और साधारण (Vishwanath and Sons Review) क्लाइमैक्स फिल्म को पूरी तरह बेहतरीन बनने से रोकता है।

