Dharmendra Property Matter: धर्मेंद्र की करोड़ों की जमी, किसे सौंपी गई वो विरासत?

Dharmendra Property Matter: बॉलीवुड के शान-ए-सिनेमाह, धर्मेंद्र के निधन की खबर से पूरा देश शोक में है। 24 नवंबर 2025 को 89 वर्ष की उम्र में मुंबई स्थित आवास पर निधन हो गया।
उनके निधन की खबर के बाद न सिर्फ फिल्मों के गलियारों में बल्कि उनके निजी जीवन व ज़ायदाद को लेकर कई खुलासे होने लगे।
वो जमीन कौन संभाल रहा है?
रिपोर्ट्स के अनुसार, धर्मेंद्र ने अपनी पैतृक ज़मीन — जो कि लुधियाना के डांगो गांव में स्थित है — अपने भतीजों को लगभग 2.50 एकड़ भूमि कानूनी रूप से ट्रांसफर की थी। परिवार के सदस्य बूटा सिंह का कहना है कि यह फैसला किसी लालच या दबाव से नहीं, बल्कि अभिनेता की निजी मंशा के अनुरूप लिया गया था।
कहने को, उस जमीन की आज अनुमानित कीमत लगभग 5 करोड़ रुपए बताई जा रही है। परिवार ने इस संपत्ति की देखभाल अब भी जारी रखी है। भतीजे वर्तमान में लुधियाना में एक टेक्सटाइल मिल में काम करते हैं।
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परिवार का रुख और पारिवारिक समझ
बताया जा रहा है कि धर्मेंद्र चाहते थे कि उनकी पैतृक ज़मीन सीधे उनके नाती-पोते या बड़े नामों तक न जाएं — बल्कि एक साधारण व जिम्मेदार व्यक्ति को मिले। इसलिए उन्होंने अपने भतीजों को जमीन सौंपी।
इस कदम का उद्देश्य न सिर्फ पारिवारिक विरासत संभालना था, बल्कि इस ज़मीन के टूटने और विवाद में फँसने से बचना भी था। परिवार का कहना है कि यह सौंप-तबादला कानूनी रूप से क्लियर था — किसी दिग्गज नामीनामा या दबाव के बिना।
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आज का हाल — विरासत बची या दब गई?
हालांकि जमीन का ट्रांसफर कर दिया गया था, लेकिन परिवार आज भी उस पैतृक घर और ज़मीन की देखभाल करता है। मतलब — विरासत नाम की पकड़ अभी भी कायम है। लेकिन, इतने बड़े नाम के पीछे भी यह दिखाता है कि जमीन-संपत्ति सिर्फ नाम से नहीं, जिम्मेदारी और देखभाल से होती है।
भतीजा, जो कि टेक्सटाइल मिल में काम करता है, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त है; फिर भी ज़मीन की देखभाल परिवार द्वारा की जा रही है — एक तरह से धर्मेंद्र की मंशा को ज़िंदा रखने की कोशिश।
ज़मीन से बड़ा है — विरासत का संस्कार
धर्मेंद्र ने यह साबित कर दिया कि असली विरासत सिर्फ पैसे या नाम नहीं — जिम्मेदारी, पारिवारिक सम्मान और आज्ञा होती है। पैतृक ज़मीन भले ही करोड़ों की हो, लेकिन जिसने उसे संभाला, ज़रूर उसे परिवार के लिए वक़्फ करने की जिम्मेदारी समझी।
उनका यह फैसला यह भी दिखाता है कि विरासत बांटने में सोच-समझ और न्याय होना चाहिए — सिर्फ नाम या संपत्ति के लिए नहीं।

