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Increasing Unmarried Women: भारत में बढ़ रही है शादी न करने की प्रवृत्ति, कितनी फीसदी महिलाएं रह रही हैं अविवाहित?

भारत में शादी न करने वाली महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जहां 24-25% महिलाएं अब अविवाहित रहना पसंद कर रही हैं। करियर, आर्थिक आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कारण वे पारंपरिक विवाह से दूरी बना रही हैं। यह प्रवृत्ति समाज में बड़े सामाजिक और आर्थिक बदलावों की ओर इशारा करती है।

Increasing Unmarried Women: भारत में शादी को पारंपरिक रूप से जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में यह धारणा तेजी से बदल रही है। अब कई महिलाएं शादी करने से परहेज कर रही हैं और स्वतंत्र जीवन को प्राथमिकता दे रही हैं। आंकड़ों के अनुसार, देश में अविवाहित महिलाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है, जिससे कुंवारे पुरुषों के लिए यह चिंता का विषय बनता जा रहा है।

कितनी फीसदी महिलाएं नहीं कर रहीं शादी?

हाल के सर्वेक्षणों और जनगणना डेटा के अनुसार, भारत में 2011 में 20 से 29 वर्ष की उम्र की करीब 13% महिलाएं अविवाहित थीं, जबकि 2023 तक यह आंकड़ा 24-25% तक पहुंच गया है। यानी एक दशक में शादी न करने वाली महिलाओं की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में यह प्रवृत्ति और भी बढ़ सकती है, क्योंकि महिलाएं अब अपने करियर और स्वतंत्रता को प्राथमिकता दे रही हैं। कई महिलाएं सामाजिक दबाव से परे जाकर अपनी शर्तों पर जीवन जीने का निर्णय ले रही हैं।

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शादी न करने के पीछे क्या कारण हैं?

अविवाहित रहने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी के पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत कारण जुड़े हुए हैं। कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:

  1. करियर और आत्मनिर्भरता:

आज की महिलाएं शिक्षा और करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। वे पहले आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनना चाहती हैं और अपने जीवन पर पूर्ण नियंत्रण रखना चाहती हैं। शादी के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ करियर पर असर डाल सकता है, इसलिए कई महिलाएं विवाह से बच रही हैं।

  1. स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद:

नए दौर की महिलाएं व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बहुत महत्व देती हैं। वे अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेना चाहती हैं और पारंपरिक विवाह की सामाजिक बंधनों से दूर रहना पसंद कर रही हैं।

  1. सही जीवनसाथी न मिलना:

आधुनिक महिलाओं की अपेक्षाएं बदल गई हैं। वे चाहती हैं कि उनका साथी समान विचारधारा वाला, सम्मान देने वाला और सहयोगी हो। लेकिन जब वे ऐसा साथी नहीं पातीं, तो शादी करने की बजाय अकेले रहने का विकल्प चुनती हैं।

  1. सामाजिक दबाव का कम होना:

पहले महिलाओं पर जल्दी शादी करने का सामाजिक दबाव अधिक था, लेकिन अब समय बदल चुका है। माता-पिता भी अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा और करियर में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जिससे वे बिना किसी दबाव के अपने फैसले खुद ले रही हैं।

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  1. तलाक और असफल रिश्तों का डर:

शादीशुदा जोड़ों में तलाक की बढ़ती दर भी महिलाओं को शादी से दूर कर रही है। वे नहीं चाहतीं कि वे एक असफल शादी में फंसें और जीवनभर संघर्ष करें।

कुंवारे पुरुषों के लिए बढ़ती चुनौती

जहां महिलाएं शादी न करने का फैसला ले रही हैं, वहीं कुंवारे पुरुषों के लिए यह एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में कई पुरुष अब शादी के लिए योग्य जीवनसाथी खोजने में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में यह समस्या और भी गंभीर है, जहां शादी के लिए उपयुक्त लड़कियां कम होती जा रही हैं।

समाज पर क्या असर पड़ेगा?

भारत में शादी न करने की बढ़ती प्रवृत्ति के कई सामाजिक और आर्थिक प्रभाव हो सकते हैं:

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शादी की उम्र बढ़ने से पारिवारिक संरचना में बदलाव: पहले जहां औसत विवाह उम्र 22-25 साल होती थी, अब यह बढ़कर 30 से अधिक हो रही है।

जनसंख्या वृद्धि दर पर असर: यदि शादी और बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति घटती रही, तो यह भारत की जनसंख्या वृद्धि दर को प्रभावित कर सकता है।

परंपरागत विवाह व्यवस्था में बदलाव: भविष्य में विवाह को लेकर समाज का नजरिया और अधिक लचीला हो सकता है, जिससे सहजीवन (लिव-इन रिलेशनशिप) जैसी व्यवस्थाएं अधिक आम हो सकती हैं।

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भारत में शादी को लेकर बदलते रुझान यह दर्शाते हैं कि महिलाएं अब पारंपरिक बंधनों से निकलकर अपनी पसंद की जिंदगी जीना चाहती हैं। वे करियर, आर्थिक आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता दे रही हैं, जिससे अविवाहित महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह प्रवृत्ति समाज में एक नए बदलाव की ओर इशारा करती है, जो आने वाले वर्षों में और गहरी हो सकती है।

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Written By। Mansi Negi । National Desk। Delhi

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