नई दिल्ली: आज 28 सितंबर को देश के शहीदे आज़म Bhagat Singh का 115 वां जन्मदिन मनाया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को स्वतंत्रता सेनानी शहीद भगत सिंह की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है. उन्होंने ट्वीट कर कहा, ‘‘शहीद भगत सिंह की जयंती पर मैं उन्हें नमन करता हूं. उनका साहस हमें बहुत प्रेरित करता है. देश के लिए उनके दृष्टिकोण को हम साकार करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं.’’
Bhagat Singh का जन्म कहां हुआ था
भगत सिंह का जन्म अविभाजित पंजाब के लायलपुर (अब पाकिस्तान) में 28 सितंबर 1907 को हुआ था. वह बहुत छोटी सी उम्र से ही आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए थे, और उनकी लोकप्रियता से भयभीत ब्रिटिश सरकार ने उनहें फांसी पर लटका दिया था. 23 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ जाने वाले एक नौजवान ने आजादी की ऐसी अलख जगाई, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के आसमान में भी सुराख कर दिया. भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव और राजगुरु की शहादत से हर देशवासी स्वाधीनता के लिए छटपटाने लगा.
Bhagat Singh ने अपनी स्कूली पढ़ाई दयानंद एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल में की और फिर लाहौर के नेशनल कॉलेज में आगे की पढ़ाई की. उनके माता-पिता ने उनकी शादी करने की कोशिश की तो वह अपने घर से भाग गए. उन्होंने अपने माता-पिता से कहा कि अगर उन्होंने गुलाम भारत में शादी की, तो उनकी दुल्हन केवल मौत होगी. इसके बाद वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल हो गए.
उन्होंने सुखदेव के साथ मिलकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने की योजना बनाई और लाहौर में पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट को मारने की साजिश रची. लेकिन वे स्कॉट को ठीक तरह से पहचान नहीं पाए और उन्होंने असिस्टेंट पुलिस अधीक्षक जॉन सॉन्डर्स को गोली मार दी.
हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां इतिहास को बेहद अलग तरीके से लोगों के सामने रखा जा रहा है। ये एक ऐसा वक्त है जहां इतिहास को सही ढंग से पढ़ना और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है। चूंकि इस समय देश में गैर-कांग्रेसी सरकार है इसलिए पंडित जवाहरलाल नेहरू को लेकर अलग-अलग दावे न सिर्फ सरकार की ओर से किये जाते हैं बल्कि सत्तापक्ष के नेता भी , जो सरकार का हिस्सा नहीं हैं, अलग-अलग टिप्पणियां करते रहते हैं।
आखिर क्यों चलता है सुभाष बनाम नेहरू?
वहीं मौजूदा सरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगाने के बहाने खुद को राष्ट्रवादी, देशभक्त दिखाने का प्रयास करती दिखती है। दिक्कत खुद के राष्ट्रवाद के प्रचार से नहीं है बल्कि दिक्कत इस बात से है, जिसमें सुभाष बनाम नेहरू की बहस की शुरूआत कर दी जाती है। जैसे कि ये दोनों नेता एक दूसरे के कड़े प्रतिद्वंद्वी रहे हों। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि देश के इतिहास को अच्छे से पढ़ा जाए। इस लेख का मकसद नेहरू का महिमामंडन करना नहीं है बल्कि ये बताना है कि इतिहास में जो चीजें मौजूद हैं आज उसको बेहद अलग तरीके से बताया जाता है।
आज के दिन की ही बात कर लीजिए, आज शहीद-ए-आजम Bhagat Singh की जयंती है। इस मौके पर ये जानना बेहद दिलचस्प हो जाता है कि अगर भगत सिंह को नेहरू या सुभाष में से किसी एक को चुनना होता तो वे किसको चुनते? इस बाबत उनका एक लेख जुलाई ,1928 के ‘किरती’ अखबार में छपा था।
भगत सिंह लिखते हैं कि सुभाष और नेहरू दोनों ही भारत की आजादी के कट्टर समर्थक हैं, समझदार और देशभक्त हैं. लेकिन दोनों नेताओं के विचारों में बहुत अंतर है. भगत सिंह नेताजी सुभाष को प्राचीन संस्कृति का उपासक और कोमल ह्रदयवाला भावुक शख्स कहते हैं, जबकि नेहरू को पश्र्चिम का शिष्य और युगांतकारी बताते हैं. नेहरू और सुभाष दोनों ही कांग्रेस के गरम दल से संबंध रखते थे.