
Nepal Protest Update: नेपाल की राजनीति इस समय बड़े उथल-पुथल से गुजर रही है। काठमांडू की सड़कों पर दो दिन तक चले भारी विरोध और हिंसा के बाद प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की सरकार गिर गई। हालात इतने बिगड़ गए कि सेना को मोर्चा संभालना पड़ा। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल ने सैनिकों को तैनात कर माहौल को काबू में किया और शांति बहाल की।
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Gen-Z आंदोलन का दबाव
नेपाल की मौजूदा राजनीति में युवाओं की बड़ी भूमिका है। इस बार Gen-Z आंदोलन ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला। लगातार विरोध प्रदर्शनों के बाद जब हालात सामान्य हुए, तो आंदोलनकारियों ने गुरुवार सुबह सेना अधिकारियों से बातचीत की।
करीब 15 युवा प्रतिनिधि भद्रकाली बेस पर सेना के अधिकारियों से मिले। बैठक में युवाओं ने अंतरिम सरकार के लिए कुछ नाम सुझाए। इनमें सबसे अहम नाम था पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की का। इसके अलावा काठमांडू के मेयर बलेंद्र शाह, पूर्व स्पीकर ओन्सारी घर्ती मगर, वकील ओम प्रकाश आर्याल, डॉ. गोविंद केसी, ब्रिगेडियर जनरल प्रेम शाही और पूर्व चुनाव आयुक्त नीलकंठ उप्रेती के नाम भी सामने आए।
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बैठक में फंसा पेच
बातचीत अच्छे माहौल में चल रही थी, लेकिन अचानक मतभेद सामने आ गए। आंदोलन के एक प्रतिनिधि रक्षा बम ने बैठक बीच में ही छोड़ दी। उनका आरोप था कि सेना ने इस बातचीत में कारोबारी दुर्गा प्रसाई और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को भी शामिल करने का सुझाव दिया।
रक्षा बम का कहना था कि दुर्गा प्रसाई हिंदू राजशाही की बहाली की मांग करते रहे हैं और यह आंदोलन लोकतंत्र बचाने के लिए चल रहा है। वहीं, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी पर आरोप है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ तो आवाज उठाती है, लेकिन असल में मौजूदा व्यवस्था का बचाव करती है।
बम ने साफ कहा कि इन दोनों को शामिल करना आंदोलन की सच्चाई और ईमानदारी पर सवाल खड़े करता है। इसलिए उन्होंने बैठक छोड़ दी। इससे साफ हो गया कि Gen-Z आंदोलन के अंदर भी सभी गुटों की राय एक जैसी नहीं है।
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आखिरकार बनी सहमति
लंबी चर्चा और मतभेदों के बीच अंत में सबकी राय सुशीला कार्की के नाम पर बनी। लेकिन उन्हें मनाना आसान नहीं था। सेना प्रमुख जनरल सिग्देल खुद रात 2 बजे कार्की के घर पहुंचे और उन्हें समझाने की कोशिश की।
उन्होंने कहा कि इस मुश्किल दौर में देश को स्थिर करने के लिए कार्की सबसे सही चेहरा हैं। हालांकि कार्की तुरंत मानने को तैयार नहीं हुईं। उन्हें समझाने और मनाने में पूरे 15 घंटे लग गए। बाद में जब Gen-Z आंदोलन के युवाओं ने औपचारिक तौर पर उनसे नेतृत्व संभालने की अपील की, तब जाकर उन्होंने हामी भरी।
बलेंद्र शाह का समर्थन
दिलचस्प बात यह रही कि काठमांडू के मेयर बलेंद्र शाह, जिनका नाम भी अंतरिम नेतृत्व के लिए सुझाया गया था, उन्होंने खुद सुशीला कार्की के पक्ष में कदम पीछे खींच लिए और उनका समर्थन किया। इससे यह साफ हो गया कि कार्की का नाम सबसे मजबूत है।
अब नेपाल की अंतरिम सरकार की जिम्मेदारी पूर्व जस्टिस सुशीला कार्की के हाथ में होगी। लोग मानते हैं कि उनका अनुभव और साफ छवि नेपाल की राजनीति को स्थिर करने में मददगार होगी। फिलहाल पूरा देश उनकी अगुवाई से नई उम्मीदें जोड़ रहा है।

