Pakistan Army criticism: पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान में बढ़ा सेना विरोध, मौलाना फजलुर रहमान ने आर्मी पर बोला सीधा हमला

Pakistan Army criticism: पाकिस्तान में एक बार फिर सेना विरोधी माहौल तेज हो गया है। पिछले कुछ समय से पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में सेना की भूमिका को लेकर नाराजगी बढ़ती दिखाई दे रही है। पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सेना की नीतियों और फैसलों पर उठ रहे सवालों ने इस विरोध को और भड़का दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर ने भारत के साथ तनाव बढ़ाकर घरेलू राजनीति में सेना विरोधी लहर को शांत करने की कोशिश की थी, लेकिन यह रणनीति अब उलटी पड़ती दिख रही है।
पहलगाम हमले के बाद सेना की नीयत पर उठे सवाल
सूत्रों के अनुसार, पहलगाम में आतंकी हमला करवाने के पीछे पाकिस्तानी सेना की मंशा घरेलू असंतोष को दबाने की थी। माना जा रहा है कि सेना यह दिखाना चाहती थी कि पाकिस्तान की सुरक्षा चुनौतियों के बीच राजनीतिक अस्थिरता की जिम्मेदारी उसी पर नहीं थोपी जानी चाहिए। लेकिन यह कदम जनता के एक बड़े हिस्से को रास नहीं आया और देश में फिर से सेना विरोधी आवाजें तेज हो गईं।
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रिपोर्ट्स का कहना है कि जनरल असीम मुनीर भले ही भारत के साथ तनाव बढ़ाने में सफल दिखे हों, लेकिन पाकिस्तान में परिस्थितियाँ उनके नियंत्रण से बाहर जाती नजर आ रही हैं। आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और राजनीतिक उथल-पुथल ने सेना पर जनता का भरोसा और कमजोर कर दिया है।
मौलाना फजलुर रहमान का सेना पर सबसे बड़ा हमला
इस बीच पाकिस्तान के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक-धार्मिक नेताओं में शामिल जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने सेना पर अब तक का सबसे बड़ा हमला बोला है। एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने पाकिस्तान की सेना को उसकी असफलताओं के लिए जमकर घेरा।
फजलुर रहमान ने कहा, “इतिहास गवाह है कि कैसे एक हिंदू कमांडर के सामने 90 हजार से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने सरेंडर कर दिया था। यह सरेंडर पाकिस्तान की सबसे बड़ी बेइज्जती थी।”
उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान की सेना ने देश को बनाने में नहीं, बल्कि उसे नुकसान पहुंचाने में ज्यादा भूमिका निभाई है। उनके अनुसार, “सन 1971 में 90 हजार फौजियों का सरेंडर हमारी नाक कटवाने जैसा था और आज भी सेना की वही मानसिकता देश को कमजोर कर रही है।”
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सभा में लगे ‘शर्म करो’ के नारे, सेना पर जनता की नाराजगी उजागर
मौलाना फजलुर रहमान के भाषण के दौरान वहां मौजूद लोगों ने भी सेना के खिलाफ गुस्सा जाहिर किया। जैसे ही उन्होंने 1971 के सरेंडर का जिक्र किया, लोगों ने जोर-जोर से “शर्म करो, शर्म करो” के नारे लगाने शुरू कर दिए। इस घटना ने साफ कर दिया कि पाकिस्तान में एक बड़ा तबका सेना के प्रदर्शन से गहरी नाराजगी रखता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मौलाना फजलुर रहमान द्वारा सेना की खुली आलोचना यह दर्शाती है कि हालात पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हैं। आमतौर पर पाकिस्तान के बड़े नेता सेना की आलोचना करने से बचते हैं, लेकिन अब हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि शीर्ष नेता भी खुलकर बोलने लगे हैं।
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पाकिस्तान की राजनीति में सेना की गिरती साख और नई चुनौतियाँ
पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान में सेना की भूमिका को लेकर बहस तेज हुई है। आर्थिक बदहाली, बढ़ते विदेशी कर्ज, राजनीतिक अस्थिरता और आंतरिक सुरक्षा विफलताओं ने सेना की साख को भारी नुकसान पहुंचाया है। इमरान खान की सरकार गिराने के बाद से सेना पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप और ज्यादा बढ़ गए हैं।
पहलगाम हमले के बाद सेना की नीयत पर उठते सवाल और मौलाना फजलुर रहमान जैसे नेताओं के बयान इस बात का संकेत हैं कि पाकिस्तान की राजनीति में सेना के प्रभाव कम होने की शुरुआत हो सकती है। सेना विरोधी माहौल ने जनरल असीम मुनीर के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं, जिनसे निपटना आसान नहीं होगा।

