Khawaja Asif Statement: ख्वाजा आसिफ के कबूलनामे के बाद बलूचिस्तान में बढ़ते बीएलए हमलों के बीच पाकिस्तानी सेना का काफिला
Khawaja Asif Statement: बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन विडंबना यह है कि आजादी के 75 साल बाद भी यह इलाका विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं में सबसे पीछे है। गैस, सोना, तांबा और खनिज संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद बलूचिस्तान की जनता खुद को हाशिये पर खड़ा महसूस करती है। यही भावना दशकों से असंतोष को जन्म देती रही, जो अब खुले विद्रोह का रूप ले चुकी है।
बलूच नेताओं और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इस्लामाबाद की सत्ता ने बलूचिस्तान को केवल ‘संसाधन बैंक’ की तरह इस्तेमाल किया। गैस सुई से निकलकर लाहौर और कराची तक पहुंचती रही, लेकिन जिन इलाकों से यह गैस निकली, वहां के गांव अंधेरे में डूबे रहे। इसी अन्याय ने बलूच युवाओं को हथियार उठाने की ओर धकेला।
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BLA के हमलों से कांपी पाक सेना
हाल के महीनों में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने अपने हमलों की तीव्रता और दायरा दोनों बढ़ा दिए हैं। क्वेटा, ग्वादर, पंजगुर और तुर्बत जैसे संवेदनशील इलाकों में हुए हमलों ने पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा एजेंसियों की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इन हमलों में –
- सेना की चौकियों को सीधे निशाना बनाया गया
- सैन्य काफिलों पर घात लगाकर हमले हुए
- CPEC से जुड़े निर्माण स्थलों और लॉजिस्टिक रूट्स पर अटैक किए गए
सरकारी बयान भले ही नुकसान को ‘सीमित’ बताने की कोशिश करते रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पाक सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी है। सोशल मीडिया और स्थानीय रिपोर्ट्स ने उन दावों की पोल खोल दी, जिन्हें लंबे समय तक दबाने की कोशिश की गई।
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का कबूलनामा
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का हालिया बयान इस पूरे संकट में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। संसद और मीडिया के सामने उन्होंने जो स्वीकार किया, उसने सेना के ‘सब कुछ नियंत्रण में है’ वाले नैरेटिव को झकझोर कर रख दिया।
ख्वाजा आसिफ ने साफ तौर पर माना कि –
- बलूचिस्तान में हालात तेजी से सेना के नियंत्रण से बाहर जा रहे हैं
- विद्रोहियों को स्थानीय स्तर पर समर्थन मिल रहा है
- केवल सैन्य ताकत के बल पर समस्या को दबाया नहीं जा सकता
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ‘पिछली सरकारों की गलत नीतियों और दमनकारी रवैये ने बलूचिस्तान को एक विस्फोटक स्थिति में पहुंचा दिया है।’ यह बयान इसलिए अहम है, क्योंकि पाकिस्तान में आमतौर पर सेना और सरकार इस तरह की सच्चाई सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करतीं।
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क्यों फेल हो रही है पाक सेना?
विशेषज्ञों का मानना है कि पाक सेना की नाकामी किसी एक वजह से नहीं, बल्कि कई गहरी समस्याओं का नतीजा है –
- स्थानीय समर्थन का अभाव
बलूच जनता सेना को सुरक्षा देने वाली ताकत नहीं, बल्कि कब्जेदार के रूप में देखती है। जब जनता का भरोसा न हो, तो किसी भी सैन्य अभियान की सफलता संदिग्ध हो जाती है।
- गोरिल्ला युद्ध में BLA की बढ़त
BLA छोटे, तेज और स्थानीय भूगोल से परिचित समूहों में काम करती है। यह रणनीति भारी हथियारों से लैस सेना के लिए भी बड़ी चुनौती बन गई है।
- खुफिया तंत्र की कमजोरी
ISI और अन्य एजेंसियों की स्थानीय नेटवर्क पर पकड़ कमजोर पड़ती दिख रही है। कई हमले ऐसे इलाकों में हुए, जहां सुरक्षा व्यवस्था मजबूत मानी जाती थी।
- दमन बनाम संवाद की नीति
पाकिस्तान ने दशकों तक बलूचिस्तान में राजनीतिक संवाद की बजाय सैन्य दमन को प्राथमिकता दी, जिससे समस्या और जटिल होती चली गई।
CPEC बना पाक सेना के लिए सिरदर्द
चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) को पाकिस्तान विकास की रीढ़ बताता है, लेकिन बलूचिस्तान में इसे शोषण और बाहरी दखल का प्रतीक माना जाता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि CPEC से उन्हें रोजगार या लाभ नहीं मिला, बल्कि उनकी जमीन और संसाधन छीन लिए गए।
BLA द्वारा चीनी इंजीनियरों और प्रोजेक्ट्स को निशाना बनाए जाने से –
- चीन की सुरक्षा चिंताएं बढ़ी हैं
- पाक सेना पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा है
- पाकिस्तान की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचा है
यही वजह है कि अब चीन भी इस प्रोजेक्ट की सुरक्षा को लेकर पहले से कहीं ज्यादा सतर्क नजर आ रहा है।
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क्या टूट की कगार पर है पाकिस्तान?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बलूचिस्तान का संकट सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है। यह अब पाकिस्तान की एकता और संघीय ढांचे के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।
खुद रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ की चेतावनी, ‘अगर राजनीतिक समाधान नहीं निकाला गया, तो हालात और भयावह हो सकते हैं।’ इस बात का संकेत है कि सत्ता के गलियारों में भी खतरे की घंटी बज चुकी है।
भारत और दुनिया की नजर
भारत पहले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा उठा चुका है। अब जब पाकिस्तानी मंत्री खुद सेना की विफलता और हालात की गंभीरता स्वीकार कर रहे हैं, तो पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक मोर्चे पर मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
बलूचिस्तान आज सिर्फ एक प्रांत नहीं, बल्कि पाकिस्तान की नीतियों, सैन्य रणनीति और राजनीतिक सोच की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि इस संकट का हल संवाद से निकलता है या टकराव इसे और भड़काता है।

