Jolly LLB 3 Review: अक्षय-अरशद की कोर्टरूम ड्रामा में क्लाइमेक्स है दिलचस्प, सौरभ शुक्ला ने चुराई पूरी लाइमलाइट

Jolly LLB 3 Review: अक्षय कुमार और अरशद वारसी की बहुप्रतीक्षित कोर्टरूम ड्रामा फिल्म जॉली एलएलबी 3 आखिरकार थिएटर में आ चुकी है। फिल्म का क्लाइमेक्स जबरदस्त है, लेकिन क्या कहानी और जौलीनेस पिछली दो फिल्मों की तरह दर्शकों को पूरी तरह बांध पाती है, यह सवाल बनता है। सुभाष कपूर की यह तीसरी फिल्म किसानों की आत्महत्या और भूमि अधिग्रहण जैसी संवेदनशील सामाजिक समस्याओं को पर्दे पर लाती है।
फिल्म में अदालत की कार्यवाही, हास्य और व्यंग्य का संतुलन बना हुआ है। अक्षय कुमार और अरशद वारसी की केमिस्ट्री हॉल में हंसी और उत्साह दोनों भर देती है। वहीं, सौरभ शुक्ला की दमदार टाइमिंग और भूमिका फिल्म का दिल हैं, जो हर सीन में नजर आती है।
कहानी का आरंभ और मामला
Jolly LLB 3 की कहानी राजस्थान के परसौल गांव से शुरू होती है। उद्योगपति हरिभाई खेतान (गजराज राव) अपने “बीकानेर टू बोस्टन” प्रोजेक्ट के लिए किसान राजाराम सोलंकी (रॉबिन दास) की पुश्तैनी जमीन लेने की कोशिश करता है। राजाराम जमीन बेचने से इनकार करता है और कर्ज लौटाने में असमर्थ होता है। तहसीलदार की गलती और दबाव के कारण जमीन का अस्थायी मालिकाना हक देनदार को सौंप दिया जाता है।
आहत राजाराम अपनी जान दे देता है और कुछ साल बाद राजाराम की विधवा जानकी (सीमा बिस्वास) इस मामले को दिल्ली की अदालत में ले आती हैं। शुरुआत में जगदीश्वर मिश्रा (अक्षय कुमार) जानकी के खिलाफ लड़ते हैं, लेकिन बाद में जॉली और मिश्रा मिलकर केस लड़ते हैं। हाई प्रोफाइल वकील विक्रम (राम कपूर) खेतान की पैरवी करते हैं, जो विकास और बिजनेस की तर्कसंगतता की ओर जोर देते हैं।
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क्लाइमेक्स और बारीकियां
सुभाष कपूर की निर्देशकीय शैली जॉली एलएलबी 3 में कायम है। मध्यांतर तक कहानी दोनों जॉली के बीच नोकझोंक पर केंद्रित है, वहीं किसानों के मुद्दे और अदालत की कार्यवाही भी प्रमुख हैं। कुछ दृश्यों में उम्मीद के मुताबिक हरिभाई की कानूनी टीम का प्रभुत्व और पलटवार नहीं दिखता, जिससे सौरभ शुक्ला का जज का किरदार और अहम हो जाता है।
एक्टिंग और स्क्रीन प्रेजेंस
अरशद वारसी और अक्षय कुमार की केमिस्ट्री फिल्म की बड़ी ताकत है। अक्षय के पास अधिक मजबूत दृश्यों और वन लाइनर हैं। सीमा बिस्वास की खामोशी प्रभावशाली है, उनकी आंखों में दर्द और ताकत झलकती है। गजराज राव का खलनायक किरदार थोड़े कमजोर लेखन के बावजूद याद रहता है। राम कपूर सहज हैं, जबकि हुमा कुरैशी और अमृता राव को कम स्क्रीन टाइम मिला है। सौरभ शुक्ला ने हर फ्रेम में अपनी टाइमिंग और संवाद कला से सभी का ध्यान खींचा। उनकी भूमिका फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण है।
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फिल्म का संदेश
जॉली एलएलबी 3 किसानों की अहमियत और उनके अधिकारों की ओर ध्यान आकर्षित करती है। अंतिम जिरह में जगदीश त्यागी कहता है, ‘जब हरिभाई की मर्जी की वैल्यू है, विक्रम की है … फिर जानकी राजाराम की मर्जी की वैल्यू क्यों नहीं है।’
इस संवाद में फिल्म का मूल संदेश है,न्याय हर किसी का समान होना चाहिए।

