Alankar Agnihotri resignation: क्या था रॉलेट एक्ट? जिसकी तुलना कर बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने छोड़ा पद
Rowlatt Act 1919: बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बने हुए हैं। उन्होंने UGC की नई गाइडलाइन और शंकराचार्य से जुड़े मुद्दे को लेकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही उन्होंने UGC की नई गाइडलाइन की तुलना अंग्रेजों के दौर के रॉलेट एक्ट, 1919 से कर दी। उन्होंने इस कानून को ‘काला कानून’ बताते हुए कहा कि यह सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकारों का हनन करता है। उनके इस बयान के बाद लोगों के मन में सवाल उठने लगा कि आखिर रॉलेट एक्ट क्या था, और क्यों महात्मा गांधी जैसे बड़े नेता ने इसका खुलकर विरोध किया था।
क्या था रॉलेट एक्ट?
रॉलेट एक्ट को अंग्रेजी हुकूमत ने मार्च 1919 में लागू किया था। इसे आधिकारिक तौर पर अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम कहा गया। इस कानून का नाम उस कमेटी के अध्यक्ष सर सिडनी रॉलेट के नाम पर रखा गया, जिन्होंने इसका मसौदा तैयार किया था। इस कानून का मकसद था भारत में बढ़ रही आजादी मांग और क्रांतिकारी गतिविधियों को दबाना। अंग्रेज सरकार को डर था कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारतीयों में विद्रोह और तेज हो सकता है।
रॉलेट एक्ट क्यों था खतरनाक?
रॉलेट एक्ट के तहत ब्रिटिश सरकार को बेहद सख्त और अमानवीय अधिकार मिल गए थे। इस कानून की सबसे खतरनाक बात यह थी कि-
● किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमे के जेल में डाला जा सकता था
● शक के आधार पर 2 साल तक हिरासत में रखा जा सकता था
● पुलिस बिना वारंट घरों की तलाशी ले सकती थी
● लोगों की बोलने और इकट्ठा होने की आज़ादी छीन ली गई थी
● इसी वजह से भारतीयों ने इसे काला कानून कहा।
महात्मा गांधी ने क्यों किया विरोध?
महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट को भारतीयों की नागरिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया। उनका मानना था कि यह कानून निर्दोष लोगों को जेल में डालने और उन्हें प्रताड़ित करने का रास्ता खोल देगा। 30 मार्च 1919 को गांधी जी ने पूरे देश में रॉलेट सत्याग्रह की शुरुआत की। 6 अप्रैल 1919 को कांग्रेस के नेतृत्व में देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। गांधी जी ने साफ कहा कि यह कानून मानवाधिकारों का उल्लंघन है और इसका अहिंसक तरीके से विरोध किया जाएगा।
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देशभर में फैला विरोध
रॉलेट एक्ट के खिलाफ आंदोलन तेजी से पूरे भारत में फैल गया। दिल्ली, पंजाब और अन्य कई इलाकों में हालात बिगड़ने लगे। अंग्रेज सरकार ने दमन की नीति अपनाई और कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। पंजाब में कांग्रेस के दो बड़े नेता डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल को गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे लोगों का गुस्सा और भड़क गया।
जलियांवाला बाग हत्याकांड
13 अप्रैल 1919 को अमृतसर में बैसाखी के दिन लोग शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा हुए थे। वे रॉलेट एक्ट का विरोध कर रहे थे और गिरफ्तार नेताओं की रिहाई की मांग कर रहे थे। इसी दौरान कर्नल रेजिनाल्ड डायर अपने सैनिकों के साथ जलियांवाला बाग पहुंचा और बिना किसी चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलवा दीं। इस गोलीकांड में सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए। यह घटना भारतीय इतिहास का सबसे काला अध्याय बन गई।
अंग्रेजों को झुकना पड़ा
जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया। महात्मा गांधी और अधिक दृढ़ हो गए। 1920 में उन्होंने असहयोग आंदोलन शुरू किया, जिसने आजादी लड़ाई को नई दिशा दी। लगातार बढ़ते विरोध और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते आखिरकार अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा और 1922 में रॉलेट एक्ट को रद्द कर दिया गया।
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आज क्यों हो रही है रॉलेट एक्ट की चर्चा?
बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने UGC की नई गाइडलाइन की तुलना रॉलेट एक्ट से करते हुए कहा कि यह नियम भी एक वर्ग विशेष पर दबाव डालने वाला है।
उनका कहना है कि जैसे रॉलेट एक्ट ने अंग्रेजों को असीमित अधिकार दिए थे, वैसे ही नई गाइडलाइन से छात्रों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। उनके इस बयान और इस्तीफे ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।
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रॉलेट एक्ट केवल एक कानून नहीं था, बल्कि यह अंग्रेजी शासन के अत्याचार का प्रतीक था। इसके विरोध ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को और मजबूत किया। आज जब इसकी तुलना आधुनिक नीतियों से की जा रही है, तो यह बहस फिर से सामने आ गई है कि कानून जनता की सुरक्षा के लिए हों, न कि दमन के लिए।

