UP Assembly Elections 2027: Mayawati's Declining Base and Dalit Vote Battle
UP Assembly Elections 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक एक बार फिर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़े सियासी मुद्दों में शामिल हो गया है। कभी दलित राजनीति का सबसे मजबूत चेहरा रहीं मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी अब पहले जैसी स्थिति में नहीं हैं। पिछले दो विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में BSP के कमजोर प्रदर्शन ने राज्य की राजनीति में एक खाली जगह पैदा कर दी है, जिसे भरने के लिए बीजेपी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और चंद्रशेखर आजाद की (UP Assembly Elections 2027) आजाद समाज पार्टी लगातार कोशिश (UP Assembly Elections 2027) कर रही हैं।
एक समय उत्तर प्रदेश में दलित वोट का बड़ा हिस्सा मायावती के साथ खड़ा दिखाई देता था, लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। 2027 के विधानसभा चुनाव में असली मुकाबला सिर्फ सत्ता हासिल करने का नहीं, बल्कि दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का भी होगा। सवाल यही है कि अगर BSP का जनाधार लगातार कमजोर होता गया तो मायावती (UP Assembly Elections 2027) का पुराना वोट बैंक आखिर किसके खाते में जाएगा?
206 सीटों से सिर्फ एक सीट तक पहुंची BSP
उत्तर प्रदेश की राजनीति में BSP का उदय बेहद प्रभावशाली रहा है। 1984 में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना दलितों और वंचित वर्गों को राजनीतिक आवाज देने के उद्देश्य से की थी। बाद में मायावती ने पार्टी की कमान संभाली और BSP को प्रदेश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकतों में शामिल कर दिया। 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती के नेतृत्व में BSP ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया था। पार्टी ने 206 सीटों पर जीत दर्ज की थी और उसे 30.43 फीसदी वोट (UP Assembly Elections 2027) मिले थे। उस दौर में दलित मतदाता BSP का सबसे मजबूत आधार माने जाते थे।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह समीकरण तेजी से बदला है। 2022 के विधानसभा चुनाव में BSP सिर्फ एक सीट जीत सकी और उसका वोट शेयर घटकर 12.88 फीसदी रह गया। इससे पहले 2017 में पार्टी ने 19 सीटें जीती थीं और उसे 22.23 फीसदी वोट मिले थे।
2024 के लोकसभा चुनाव ने BSP की गिरती पकड़ को और स्पष्ट कर दिया। पार्टी उत्तर प्रदेश में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर 2019 के 19.43 फीसदी से घटकर 9.4 फीसदी रह गया। लगातार चुनावी कमजोर (UP Assembly Elections 2027) प्रदर्शन ने मायावती के सामने 2027 (UP Assembly Elections 2027) के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
मायावती के सामने दलित के साथ OBC वोट जोड़ने की चुनौती
2027 के चुनाव से पहले मायावती ने पार्टी को दोबारा मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है। उन्होंने संकेत दिया है कि आगामी विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों का अंतिम फैसला वही करेंगी, न कि उनके भतीजे आकाश आनंद। आकाश आनंद ने भी हाथरस के सादाबाद से 2027 विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के अभियान (UP Assembly Elections 2027) की शुरुआत की है। इससे BSP के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर चल रही खींचतान भी चर्चा में है।
मायावती ने चुनाव से पहले किसी भी प्री-पोल गठबंधन की संभावना से इनकार किया है। साथ ही उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से संगठन को मजबूत करने और OBC मतदाताओं के बीच पहुंच बढ़ाने को कहा है। BSP के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अपने पारंपरिक दलित वोट को बचाए रखने की नहीं, बल्कि दलित और OBC के उस सामाजिक समीकरण (UP Assembly Elections 2027) को दोबारा तैयार करने की है, जिसने 2007 में पार्टी को अपने दम पर सत्ता तक (UP Assembly Elections 2027) पहुंचाया था।
BJP ने तेज किया दलित आउटरीच अभियान
BSP के कमजोर होने का सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि बीजेपी ने दलित मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच और मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर करने के फैसले ने इस सियासी मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया। खास बात यह है कि भदोही का नाम दिसंबर 1997 में मायावती सरकार ने संत रविदास नगर किया था, लेकिन 2014 में अखिलेश यादव सरकार ने इसे फिर से भदोही (UP Assembly Elections 2027) कर दिया था।
अब योगी सरकार ने एक बार फिर जिले को संत रविदास नगर नाम दिया है। बीजेपी ने इस फैसले के जरिए दलित समाज के बीच संत रविदास की विरासत से खुद को जोड़ने की कोशिश की है। मायावती ने भी इस फैसले का स्वागत किया, लेकिन साथ ही यह याद दिलाया कि जिले का नाम सबसे पहले उनकी सरकार ने बदला था और बाद में अखिलेश यादव (UP Assembly Elections 2027) सरकार ने इसे वापस बदल दिया था।
2024 के बाद BJP के लिए बढ़ी चुनौती
2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने मिलकर 63 अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं, तत्कालीन समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 20 सीटें मिली थीं। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश का राजनीतिक समीकरण बदल दिया। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर (UP Assembly Elections 2027) राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 43 पर जीत हासिल की।
बीजेपी के लिए फैजाबाद सीट की हार खास तौर पर महत्वपूर्ण रही, जहां सपा के अवधेश प्रसाद ने जीत दर्ज की। अवधेश प्रसाद पासी समुदाय से आते हैं और उनकी जीत ने अखिलेश यादव के PDA समीकरण को नई ताकत (UP Assembly Elections 2027) दी। बीजेपी ने इसके बाद दलितों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति और तेज की है।
अंबेडकर प्रतिमाओं से लेकर कैबिनेट तक दलितों पर फोकस
योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस साल “Dr B R Ambedkar Murti Vikas Yojna” को मंजूरी दी। इसके तहत राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों में सामाजिक सुधारकों की प्रतिमाओं के सौंदर्यीकरण और विकास के लिए एक-एक करोड़ रुपये आवंटित किए जाने हैं।बीजेपी के हालिया मंत्रिमंडल विस्तार में भी दलित और OBC प्रतिनिधित्व पर जोर दिखाई दिया। योगी सरकार में शामिल किए गए छह नए मंत्रियों में दो दलित समुदाय से हैं। इनमें पासी समुदाय से कृष्णा पासवान और वाल्मीकि (UP Assembly Elections 2027) समुदाय से सुरेंद्र सिंह डागर शामिल हैं। इसके अलावा तीन मंत्री OBC समुदायों से बनाए गए।
2027 में बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती गैर-जाटव दलित वोटों पर अपनी पकड़ बनाए रखना होगी। पार्टी नहीं चाहती कि 2024 लोकसभा चुनाव जैसा बदलाव दोबारा देखने को मिले।
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अखिलेश यादव का PDA दांव
2024 के लोकसभा चुनाव में दलित मतदाताओं का समर्थन समाजवादी पार्टी के लिए बेहद अहम साबित हुआ। अखिलेश यादव ने अपनी राजनीति को PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के इर्द-गिर्द केंद्रित किया है। 2024 में समाजवादी पार्टी ने 37 लोकसभा सीटें जीतीं। कांग्रेस के साथ मिलकर INDIA गठबंधन ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 43 सीटों पर कब्जा किया। सपा ने सामान्य सीटों से दो दलित उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। इनमें से अवधेश प्रसाद ने फैजाबाद सीट जीतकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया, जबकि मेरठ से सपा उम्मीदवार बीजेपी प्रत्याशी से महज 10,585 (UP Assembly Elections 2027) वोटों से हार गए।
अब 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए अखिलेश यादव ने सामान्य सीटों पर 14 अतिरिक्त दलित उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए 84 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं, जबकि अनुसूचित जनजाति के लिए दो सीटें आरक्षित हैं। सामान्य सीटों पर 14 अतिरिक्त दलित उम्मीदवार उतारने की रणनीति के बाद सपा की ओर से दलित उम्मीदवारों की कुल संख्या 100 तक पहुंच सकती है।
इस रणनीति का मकसद दलित मतदाताओं के बीच सपा की स्वीकार्यता बढ़ाने के साथ-साथ पार्टी पर लगे मुस्लिम-यादव पार्टी के पुराने राजनीतिक नैरेटिव को कमजोर (UP Assembly Elections 2027) करना भी है।
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कांग्रेस भी वापस पाना चाहती है दलित वोट बैंक
उत्तर प्रदेश में कभी दलित मतदाताओं के बीच कांग्रेस का मजबूत आधार हुआ करता था। लेकिन 1990 के दशक में BSP के उभार के बाद कांग्रेस का यह वोट बैंक तेजी से उसके हाथ से निकल गया। अब राहुल गांधी दलितों को कांग्रेस की राजनीति में “केंद्रीय भूमिका” देने की बात कर रहे हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि 1980 और 1990 के दशक में कांग्रेस दलित समुदाय के लिए अपेक्षित कदम नहीं उठा सकी। राहुल गांधी ने कांशीराम के योगदान की भी (UP Assembly Elections 2027) सराहना की है और कहा है कि उन्होंने दलित समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करने और उसमें आत्मविश्वास पैदा करने का काम किया।
कांग्रेस की सामाजिक न्याय की राजनीति में संविधान और डॉ. भीमराव आंबेडकर का मुद्दा भी प्रमुखता से शामिल है। राहुल गांधी लगातार संविधान और आरक्षण के मुद्दे उठाते रहे हैं। पार्टी खुद को संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने वाली ताकत के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में दलित चेहरे को भी अहम जिम्मेदारी (UP Assembly Elections 2027) दी है। पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के प्रमुख राजेंद्र पाल गौतम को 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है।
चंद्रशेखर आजाद भी तलाश रहे अपना स्वतंत्र दलित आधार
दलित राजनीति में एक और महत्वपूर्ण नाम चंद्रशेखर आजाद का है। 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से जीत हासिल करने के बाद उनकी राजनीतिक पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई। चंद्रशेखर आजाद की रणनीति बीजेपी, सपा और कांग्रेस से अलग स्वतंत्र दलित राजनीतिक आधार तैयार करने की है। हालांकि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती नगीना से बाहर अपनी लोकप्रियता और संगठन (UP Assembly Elections 2027) को पूरे उत्तर प्रदेश में विस्तार देने की है। अगर आजाद 2027 तक अपने संगठन को राज्य के अलग-अलग हिस्सों में मजबूत कर पाते हैं तो वह दलित वोटों के मुकाबले में (UP Assembly Elections 2027) एक अहम दावेदार बन सकते हैं।
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2027 में दलित वोट तय कर सकते हैं सत्ता का रास्ता
उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राजनीतिक दल अलग-अलग सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़कर चुनावी गठबंधन तैयार करते रहे हैं। मायावती भले ही पहले जैसी ताकत के साथ दलित वोटों पर पकड़ नहीं रखती हों, लेकिन दलित मतदाताओं का राजनीतिक महत्व कम नहीं हुआ है। फर्क सिर्फ इतना (UP Assembly Elections 2027) है कि अब इस वोट बैंक के दावेदार बढ़ गए हैं।
बीजेपी गैर-जाटव दलितों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है, अखिलेश यादव PDA के जरिए दलितों को सपा के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, कांग्रेस अपने पुराने दलित आधार को वापस पाने में जुटी (UP Assembly Elections 2027) है और चंद्रशेखर आजाद स्वतंत्र दलित राजनीति की जमीन तैयार कर रहे हैं।
ऐसे में 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं होगा। यह इस बात की भी परीक्षा होगी कि मायावती के कमजोर होते जनाधार के बाद दलित मतदाता किस राजनीतिक विकल्प पर भरोसा करते हैं। जिस दल को इस बड़े सामाजिक समूह का पर्याप्त समर्थन हासिल होगा, उसके लिए लखनऊ की सत्ता का रास्ता (UP Assembly Elections 2027) काफी आसान हो सकता है।

