Dehradun Municipal Corporation cleanliness committee salary scam, former councillors under control, police send notice
Municipal Scam: दून नगर निगम के स्वच्छता समिति वेतन घोटाले में एक नया मोड़ आया है। नगर कोतवाली पुलिस ने इस मामले में पूर्व पार्षदों को नोटिस जारी किया है और उन्हें दस्तावेजों के साथ उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया है। पुलिस ने उन सफाई कर्मचारियों के बारे में भी विस्तृत जानकारी मांगी है, जिनके खातों में इन पार्षदों ने वेतन भेजा था। यह कार्रवाई उस बड़े घोटाले से जुड़ी है, जिसमें करोड़ों रुपये सरकारी खजाने से फर्जी कर्मचारियों के नाम पर निकाले गए थे।
99 फर्जी कर्मचारियों के नाम पर करोड़ों का भुगतान
यह मामला तब सामने आया जब नगर निगम की जांच में पाया गया कि स्वच्छता समिति ने 99 ऐसे सफाई कर्मचारियों के नाम वेतन सूची में दर्ज किए, जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थे। आरोप है कि इन काल्पनिक कर्मचारियों के नाम पर पांच साल में करीब 9 करोड़ रुपये का वेतन जारी किया गया। यह रकम सीधे उन खातों में गई, जिन्हें कथित रूप से कुछ जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने नियंत्रित किया था।
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घोटाले का पर्दाफाश कैसे हुआ
02 दिसंबर 2023 को देहरादून नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने के बाद, तत्कालीन जिलाधिकारी सोनिका को प्रशासक नियुक्त किया गया। इसी दौरान सफाई व्यवस्था की समीक्षा के दौरान अनियमितताओं के संकेत मिले। जांच की जिम्मेदारी तत्कालीन सीडीओ झरना कामठान को दी गई। विस्तृत जांच में यह साफ हुआ कि विभिन्न वार्डों में तैनात दिखाए गए कई कर्मचारी वास्तविक रूप से मौजूद ही नहीं थे।
नौ करोड़ की चपत से हड़कंप
जांच रिपोर्ट में साफ हुआ कि 99 अज्ञात कर्मचारियों के नाम पर जारी किए गए वेतन का कुल आंकड़ा लगभग 9 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। यह रकम नगर निगम के खजाने से निकाली गई, जबकि सूची में शामिल नामों के व्यक्ति कभी भी मौके पर सफाई कार्य करते नहीं पाए गए। रिपोर्ट ने न केवल निगम प्रशासन, बल्कि पूरे शासन तंत्र में हलचल मचा दी।
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हाईकोर्ट के दखल के बाद बढ़ी कार्रवाई
करीब डेढ़ साल तक यह मामला नगर निगम और शासन स्तर पर फाइलों में दबा रहा। जांच रिपोर्ट नगर निगम से लेकर शहरी विकास निदेशालय और शासन तक घूमती रही, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। नैनीताल हाईकोर्ट ने जब इस मुद्दे पर गंभीर सवाल पूछे, तब जाकर कार्रवाई की गति तेज हुई। इसी साल 06 जून 2025 को अपर नगर आयुक्त की तहरीर पर नगर कोतवाली में मुकदमा दर्ज किया गया।
पूर्व पार्षदों पर भी गिरी गाज
पुलिस अब इस मामले में पूर्व पार्षदों की भूमिका की जांच कर रही है। नगर कोतवाली प्रभारी प्रदीप पंत ने बताया कि कुछ पूर्व पार्षदों को नोटिस भेजकर दस्तावेजों के साथ उपस्थित होने को कहा गया है। उनसे यह पूछा जाएगा कि उन्होंने किन खातों में वेतन भेजा, इसके लिए उनके पास क्या साक्ष्य हैं और जिन कर्मचारियों के नाम पर भुगतान हुआ, वे वास्तव में कहां कार्यरत थे।
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पुलिस की जांच का अगला चरण
जांच टीम न केवल दस्तावेजी साक्ष्य जुटा रही है, बल्कि जिन कर्मचारियों के नाम पर वेतन जारी हुआ, उनके घर तक पहुंचने का प्रयास भी कर रही है। उद्देश्य यह है कि यह स्पष्ट हो सके कि वेतन पाने वाला व्यक्ति वास्तविक है या सिर्फ कागजों पर मौजूद था। यदि कर्मचारियों के पते और अस्तित्व की पुष्टि नहीं होती है, तो संबंधित जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई तय मानी जा रही है।
शासन-प्रशासन पर भी उठे सवाल
इस घोटाले ने न केवल निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि शासन की निगरानी व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। वर्षों तक 99 काल्पनिक कर्मचारियों के नाम पर नियमित रूप से वेतन भुगतान होना, और इसका किसी अधिकारी द्वारा समय पर पता न लगाना, गंभीर लापरवाही और मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
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आम जनता की प्रतिक्रिया
शहरवासियों में इस घोटाले को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि जिस धन का उपयोग सफाई व्यवस्था सुधारने और वास्तविक कर्मचारियों के वेतन में होना चाहिए था, उसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया गया। कई सामाजिक संगठनों ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों।
आगे की संभावनाएं
फिलहाल पुलिस की जांच जारी है और यह उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में कई और नाम इस मामले में सामने आ सकते हैं। जांच पूरी होते ही दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तेज होगी। इस बीच, शासन स्तर पर भी इस तरह की गड़बड़ियों को रोकने के लिए नई निगरानी प्रणाली लागू करने पर विचार किया जा रहा है, ताकि सरकारी खजाने का सही उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।

