IAS Tina Dabi news: फर्जी फोटो के चक्कर में फंस गए IAS टीना डाबी और IAS नागार्जुन गौड़ा!
IAS Tina Dabi fake photo controversy : यह मामला सिर्फ दो अफसरों पर लगे आरोपों का नहीं है, बल्कि उस दौर की तस्वीर है जहां सोशल मीडिया का ट्रायल कोर्ट किसी भी उपलब्धि को मिनटों में शक के कटघरे में खड़ा कर देता है। IAS टीना डाबी हों या खंडवा के कलेक्टर ऋषव गुप्ता और IAS नागार्जुन गौड़ा, सवाल एक जैसा है क्या वाकई ‘फर्जी फोटो’ के सहारे राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किए गए, या फिर सच को आधा-अधूरा दिखाकर अफसरों की छवि पर जानबूझकर कीचड़ उछाली गई?
बाड़मेर से लेकर खंडवा तक, एक ही पैटर्न दिखता है पुरस्कार, वायरल पोस्ट, स्क्रीनशॉट, और फिर ‘AI से बनी तस्वीरों’ जैसे सनसनीखेज दावे। लेकिन जब शोर थोड़ा थमता है, तब जो तथ्य सामने आते हैं, वे सोशल मीडिया की हेडलाइनों से काफी अलग कहानी कहते हैं।
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जिला सम्मान या व्यक्तिगत प्रचार?
सबसे पहले बात बाड़मेर की। टीना डाबी जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों विज्ञान भवन, नई दिल्ली में ‘जल संचय जन भागीदारी’ कार्यक्रम के तहत प्रथम पुरस्कार लेकर लौटीं, तो यह सम्मान किसी व्यक्ति का नहीं, पूरे ज़िले का था। 79 हजार से ज्यादा जल संरक्षण संरचनाएं, व्यापक जनभागीदारी और तय समयसीमा में पूरे किए गए कार्य यही उस पुरस्कार की बुनियाद थी। इसके साथ 2 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि भी मिली।
वायरल पोस्ट और भ्रम की शुरुआत
लेकिन सोशल मीडिया ने कहानी को दूसरे मोड़ पर मोड़ दिया। कुछ पोस्ट में Catch The Rain (CTR) पोर्टल के स्क्रीनशॉट दिखाए गए और दावा किया गया कि तस्वीरें डुप्लीकेट हैं, कुछ फर्जी हैं और इसी ‘हेराफेरी’ से अवॉर्ड मिला। यहीं से भ्रम की खेती शुरू हुई।
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टीना डाबी की सफाई
टीना डाबी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा ‘यह अवॉर्ड मुझे नहीं, बाड़मेर जिले को मिला है। और यह अवॉर्ड जल संचय जन भागीदारी (JSJB) पोर्टल के सत्यापित आंकड़ों और फोटो के आधार पर मिला है, न कि CTR पोर्टल पर मौजूद किसी भी तस्वीर के आधार पर।’ उन्होंने स्पष्ट किया कि CTR पोर्टल केवल सूचनात्मक और प्रदर्शनीय है, जबकि JSJB पोर्टल पर ब्लॉक और जिला स्तर पर जांच के बाद ही फोटो अपलोड होती हैं।
डुप्लीकेट फोटो स्वीकार, लेकिन कार्रवाई भी
टीना डाबी ने यह भी स्वीकार किया कि CTR पोर्टल पर 12 में से 3 ब्लॉकों में कुछ डुप्लीकेट फोटो सामने आई हैं।लेकिन सवाल यह है क्या गलती स्वीकार करना कमजोरी है? या फिर उसी गलती पर कार्रवाई करना प्रशासनिक पारदर्शिता की मिसाल? संबंधित ब्लॉक विकास अधिकारियों पर कार्रवाई की जा रही है और सही फोटो अपलोड कराई जा रही हैं। इसके बावजूद CTR पोर्टल को JSJB पुरस्कार से जोड़कर “फर्जी अवॉर्ड” का नैरेटिव गढ़ा गया।
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खंडवा में दोहराया गया वही पैटर्न
यही कहानी खंडवा में भी दोहराई गई। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में ऋषव गुप्ता और जिला पंचायत CEO नागार्जुन गौड़ा को 18 नवंबर 2025 को राष्ट्रीय स्तर का जल पुरस्कार मिला। आरोप वही AI से बनी तस्वीरें, छोटे गड्ढों को कुआं बताना, फोटो में AI वॉटरमार्क तक दिखने के दावे।
खंडवा प्रशासन का आधिकारिक पक्ष
खंडवा जिला प्रशासन का बयान भी उतना ही स्पष्ट है। JSJB कार्यक्रम के लिए एक अलग और स्वतंत्र पोर्टल था। पूरे देश में सबसे अधिक 1.25 लाख से ज्यादा जल संरक्षण कार्यों के निर्माण के लिए खंडवा को यह सम्मान मिला। इन कार्यों की तस्वीरें ब्लॉक और जिला स्तर पर जांच के बाद ही JSJB पोर्टल पर अपलोड की गई थीं। CTR पोर्टल का JSJB पुरस्कार से कोई सीधा संबंध नहीं था, इसके बावजूद सोशल मीडिया ने दोनों को जोड़कर ‘फर्जीवाड़ा’ साबित करने की कोशिश की।
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अज्ञानता या एजेंडा?
यहां एक सवाल खड़ा होता है क्या यह अज्ञानता है या एजेंडा? जब एक ही तरह का आरोप, एक ही पैटर्न में, दो अलग राज्यों के अफसरों पर लगाया जाए, तो शक सिर्फ अफसरों पर नहीं, आरोप लगाने वालों की नीयत पर भी जाता है।
आरोप तेज, तथ्य गायब
“फर्जी फोटो” का आरोप जितनी तेजी से वायरल हुआ, उतनी ही चुप्पी तथ्यों पर साध ली गई। JSJB और CTR दो अलग कार्यक्रम, दो अलग पोर्टल इस बुनियादी फर्क को नजरअंदाज कर दिया गया और कहा गया कि IAS अफसर AI से तस्वीरें बनाकर राष्ट्रपति पुरस्कार ले गए। यह आरोप जितना बड़ा है, उतना ही गैर-जिम्मेदार भी।
रील और ट्वीट के दौर में प्रशासन की परीक्षा
क्या आज प्रशासनिक कामकाज को भी रील और ट्वीट के पैमाने पर परखा जाएगा? क्या हजारों जल संरक्षण संरचनाओं, जमीनी काम और जनभागीदारी को कुछ वायरल स्क्रीनशॉट्स के आधार पर खारिज कर दिया जाएगा?
जवाबदेही बनाम बदनाम करने की राजनीति
बाड़मेर और खंडवा दोनों मामलों में प्रशासन ने न सिर्फ सफाई दी, बल्कि जहां भी त्रुटि मिली, वहां कार्रवाई की बात भी खुलकर कही। यह रवैया बचाव का नहीं, जवाबदेही का है। इसके बावजूद ‘IAS फर्जीवाड़ा’ और ‘AI फोटो स्कैम’ जैसे शब्दों से माहौल गर्म किया गया।
सवाल पूछिए, लेकिन पूरे सच के साथ
आलोचना लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन आधे सच के सहारे किसी की साख पर हमला उसी लोकतंत्र को कमजोर करता है। टीना डाबी हों, ऋषव गुप्ता हों या नागार्जुन बी. गौड़ा अब तक सामने आए तथ्यों से यही स्पष्ट है कि पुरस्कार का आधार वह नहीं था, जो सोशल मीडिया पर दिखाया गया।
क्योंकि अगर हर राष्ट्रीय सम्मान को पहले ‘फर्जी’ साबित करना और बाद में सफाई सुनना ही परंपरा बन गई, तो सवाल सिर्फ अफसरों का नहीं, सिस्टम पर भरोसे का भी होगा।

