Chamoli News: अब 2027 में होगा हिमालयी महाकुंभ नंदा देवी राजजात का आयोजन
Uttarakhand Religious Yatra: उत्तराखंड की धार्मिक, सांस्कृतिक और आस्था से जुड़ी सबसे पवित्र यात्राओं में शामिल हिमालयी महाकुंभ नंदा देवी राजजात अब वर्ष 2026 के बजाय 2027 में आयोजित की जाएगी। यह महत्वपूर्ण निर्णय कर्णप्रयाग में आयोजित नंदा देवी राजजात समिति की बैठक में लिया गया, जिसमें यात्रा की तिथियों, मौसम संबंधी परिस्थितियों और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संभावित जोखिमों पर गहन मंथन किया गया। समिति ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास में मलमास (अधिमास) पड़ने के कारण राजजात की पारंपरिक तिथियां आगे खिसक रही थीं। इसके चलते यात्रा अगस्त के स्थान पर सितंबर माह में प्रारंभ होनी थी, जो सुरक्षा और मौसम की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।
मलमास बना आयोजन टालने की मुख्य वजह
राजजात समिति की बैठक में बताया गया कि वर्ष 2026 में नंदा नवमी की तिथि 20 सितंबर को पड़ रही है। इसी के आधार पर राजजात का शुभारंभ भी सितंबर में होना तय माना जा रहा था। लेकिन इस समय उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौसम अचानक बदलता है, बर्फबारी, बारिश और भूस्खलन की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। विशेषज्ञों और मार्ग अध्ययन दल की रिपोर्ट में यह साफ तौर पर कहा गया कि सितंबर में इतनी लंबी और दुर्गम पैदल यात्रा कराना श्रद्धालुओं, छंतोलियों और प्रशासन—सभी के लिए जोखिम भरा हो सकता है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए समिति ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि राजजात का आयोजन 2027 में करना ही सर्वथा उचित और सुरक्षित विकल्प होगा।
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कर्णप्रयाग बैठक में हुआ निर्णय
रविवार को कर्णप्रयाग में आयोजित बैठक की अध्यक्षता राजजात समिति अध्यक्ष डॉ. राकेश कुंवर ने की। बैठक में जिलाधिकारी चमोली द्वारा भेजे गए पत्र, मार्ग अध्ययन दल की रिपोर्ट और पूर्व यात्राओं के अनुभवों पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में महासचिव भुवन नौटियाल सहित कई वरिष्ठ सदस्य, सामाजिक प्रतिनिधि और राजजात से जुड़े लोग उपस्थित रहे। सभी ने एकमत होकर माना कि आस्था के इस महायज्ञ को जल्दबाजी में नहीं, बल्कि पूरी सुरक्षा, व्यवस्था और श्रद्धा के साथ संपन्न कराया जाना चाहिए।
2027 में वसंत पंचमी से होगी औपचारिक शुरुआत
बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में डॉ. राकेश कुंवर ने बताया कि वर्ष 2027 में वसंत पंचमी के अवसर पर गढ़वाल राजवंश परंपरा के अनुसार कांसुवा गांव के राजकुंवर नंदा देवी मंदिर नौटी में राजजात को लेकर मनौती मांगेंगे। इसके बाद पंचांग गणना के अनुसार यात्रा से जुड़े सभी धार्मिक अनुष्ठानों, तिथियों और कार्यक्रमों की विधिवत घोषणा की जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 2026 के लिए अब तक कोई आधिकारिक मुहूर्त घोषित नहीं किया गया था, यात्रा केवल प्रस्तावित रूप में थी।
12 साल में एक बार निकलती है राजजात
नंदा देवी राजजात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि गढ़वाल की जीवंत परंपरा, लोक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यह यात्रा हर 12 वर्ष में एक बार आयोजित होती है और इसे हिमालयी महाकुंभ भी कहा जाता है। इससे पहले नंदा देवी राजजात का आयोजन वर्ष 2014 में हुआ था, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शामिल हुए थे। अब 2027 में एक बार फिर यह ऐतिहासिक यात्रा श्रद्धा, भक्ति और लोक संस्कृति के संगम का साक्षी बनेगी।
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280 किलोमीटर की सबसे लंबी धार्मिक पैदल यात्रा
नंदा देवी राजजात को एशिया की सबसे लंबी धार्मिक पैदल यात्राओं में गिना जाता है। यह यात्रा लगभग 280 किलोमीटर की दूरी तय करती है और कुल 20 प्रमुख पड़ावों से होकर गुजरती है। इनमें से पांच पड़ाव ऐसे हैं जो पूरी तरह निर्जन, दुर्गम और अत्यंत कठिन माने जाते हैं। यात्रा की शुरुआत चमोली जिले के नौटी गांव स्थित नंदा देवी मंदिर से होती है और यह 14,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित होमकुंड में जाकर पूर्ण होती है। वापसी यात्रा चंदनियाघट से सुतोल और घाट होते हुए संपन्न होती है। पूरी यात्रा को पूर्ण करने में लगभग 20 दिन का समय लगता है।
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राजजात को लेकर पारित हुए अहम प्रस्ताव
बैठक में केवल तिथि परिवर्तन ही नहीं, बल्कि भविष्य की व्यवस्थाओं को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी पारित किए गए—
- नंदा देवी राजजात को व्यवस्थित, सुरक्षित और भव्य बनाने के लिए राजजात प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव।
- तहसील स्तर पर उपजिलाधिकारी और जिला स्तर पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में यात्रा समितियों का गठन।
- राजजात के लिए ₹5,000 करोड़ के विशेष आर्थिक पैकेज की मांग और अलग बजट मद सृजित करने का प्रस्ताव।
- बधाण क्षेत्र की मां नंदा के सभी पड़ावों सहित राजजात का आधिकारिक मानचित्र घोषित करने की मांग।
- देवराड़ा और कुरुड़ जैसे क्षेत्रों को पर्यटन मानचित्र में शामिल करने का प्रस्ताव।
इन प्रस्तावों का उद्देश्य यह है कि राजजात केवल एक आयोजन न रहे, बल्कि क्षेत्रीय विकास, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण का माध्यम बने।
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आस्था के साथ सुरक्षा भी सर्वोपरि
समिति का मानना है कि नंदा देवी राजजात आस्था का पर्व जरूर है, लेकिन इसमें लाखों श्रद्धालुओं की जान और सुरक्षा सर्वोपरि है। बदलते मौसम, जलवायु असंतुलन और पर्वतीय चुनौतियों के बीच किसी भी प्रकार का जोखिम उठाना उचित नहीं होगा। इसी सोच के साथ 2027 में यात्रा आयोजित करने का निर्णय लिया गया है, ताकि प्रशासन, स्थानीय समाज और सरकार मिलकर इसे सुरक्षित, सुव्यवस्थित और ऐतिहासिक बना सकें।

