Savitribai Phule Jayanti 2026 : बाल विवाह की बेड़ियां, समाज की गालियां और फिर इतिहास रचने वाली औरत… कौन थीं सावित्रीबाई फुले?
Savitribai Phule Biography: सावित्रीबाई फुले सिर्फ एक समाज सुधारक नहीं थीं, बल्कि वह विचार थीं, जिन्होंने 19वीं सदी की जमी-जमाई कुरीतियों को चुनौती दी। उस दौर में जब स्त्री का घर से बाहर निकलना भी अपराध माना जाता था, सावित्रीबाई ने शिक्षा, समानता और आत्मसम्मान की मशाल जलाई। पति को मुखाग्नि देने से लेकर बाल विवाह, दहेज और पर्दा प्रथा के खिलाफ संघर्ष तक उनका जीवन स्वयं एक क्रांति था।
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बाल विवाह की बेड़ियों में जकड़ा बचपन
3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के एक साधारण माली परिवार में जन्मीं सावित्रीबाई का विवाह मात्र 9 वर्ष की उम्र में ज्योतिबा फुले से हो गया। उस समय यह सामान्य बात थी। लेकिन यही विवाह उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बना। ज्योतिबा फुले समाज सुधार के पक्षधर थे और उन्होंने सबसे पहले अपनी पत्नी को शिक्षित करने का निर्णय लिया जो उस समय एक साहसिक कदम था।
अंधेरे से उजाले तक
सावित्रीबाई पढ़ना चाहती थीं और ज्योतिबा पढ़ाना। पुणे के मिशनरी स्कूल में उन्होंने शिक्षण का प्रशिक्षण लिया। लेकिन जैसे ही वह स्कूल पढ़ाने जातीं, समाज का विरोध सामने आ जाता। रास्ते में उन पर कीचड़, गोबर और पत्थर फेंके जाते। चरित्र पर सवाल उठाए गए। लेकिन सावित्रीबाई हार मानने वालों में नहीं थीं। वह एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलतीं और स्कूल पहुंचकर गंदी साड़ी बदल लेतीं। यह सिर्फ कपड़ा बदलना नहीं था, यह सोच बदलने की तैयारी थी।
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भारत का पहला बालिका विद्यालय
1848 में सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले ने पुणे के भिड़े वाड़ा में भारत का पहला बालिका विद्यालय खोला। यह स्कूल केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं था, बल्कि सामाजिक विद्रोह का प्रतीक था। यहां जाति, वर्ग और धर्म का कोई भेद नहीं था। सावित्रीबाई देश की पहली महिला शिक्षिका बनीं। जल्द ही दलितों और पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए भी कई स्कूल खोले गए।
बाल विवाह, दहेज और पर्दा प्रथा पर करारी चोट
सावित्रीबाई का संघर्ष शिक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया, दहेज प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई और पर्दा प्रथा को स्त्री की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। विधवाओं की हालत उस समय सबसे दयनीय थी। सावित्रीबाई ने विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा दिया और ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की, जहां गर्भवती विधवाओं को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन मिला।
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पति को मुखाग्नि
28 नवंबर 1890 को ज्योतिबा फुले के निधन के बाद समाज के सामने सवाल था अंतिम संस्कार कौन करेगा? सावित्रीबाई आगे बढ़ीं और स्वयं पति को मुखाग्नि दी। यह केवल एक कर्म नहीं, बल्कि पुरुष प्रधान समाज को सीधी चुनौती थी।
प्लेग में सेवा, मृत्यु में अमरता
1897 में पुणे में प्लेग फैला। लोग मरीजों से दूर भाग रहे थे, लेकिन सावित्रीबाई बीमारों को कंधे पर उठाकर अस्पताल पहुंचा रही थीं। इसी सेवा के दौरान वह स्वयं प्लेग की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। यह एक तपस्विनी का बलिदान था जो आज भी प्रेरणा है।
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आज भी जलती क्रांति ज्योति
सावित्रीबाई फुले ने साबित किया कि स्त्री किसी से कम नहीं। शिक्षा, समानता और मानवता के लिए उनका संघर्ष आज भी प्रासंगिक है। वह सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा हैं।

