Swami Prasad Maurya Latest Bayan: क्या विपक्ष अभी से हताश हो चुका है। ये सवाल इसलिए क्योंकि जैसे जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं विपक्ष के नेताओ की बयानबाज़ी का स्तर सनातन को लेकर लगातार गिरता जा रहा। वो भी ऐसे वक्त में जबकि बीजेपी सनातन को लेकर लगातार माहौल बनाने में जुटी है फिर चाहे वो अयोध्या में भव्य दीपोत्सव का आयोजन रहा हो या फिर सनातन को लेकर बीजेपी का मुखर रवैया। विपक्ष ने इस एजेंडे की काट के तौर पर जातीय जनगणना का मुद्दा उछाला था लेकिन बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं रहा। अब एक बार फिर से सनातन पर सीधा प्रहार हुआ है जिसका प्लेटफार्म एक बार फिर से स्वामी प्रसाद मौर्या ने तैयार किया है। सवाल उठता है कि क्या अब विपक्ष की जद्दोजहद सिर्फ अपना कोर वोट-बैंक बचाने भर की रह गई है। और क्या विपक्ष ये मान चुका है कि अब इसके अलावा उसके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा।
बात थोड़ी कड़वी जरुर है। मगर जो है सो है। बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे और चुनावी रणनीति के आगे विपक्ष का अब तक का हर दांव फेल रहा है। साल 2014 से भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह हिंदुत्व और विकास के एजेंडे को एक साथ लेकर काम किया उसने जातीय दीवारें गिरा दीं हैं। अब तक पिछड़ा सवर्ण दलित में बांटकर की जा रही सियासत को हिंदुत्व केंद्रित करने में बीजेपी को कामयाबी मिली नतीजा सामने है। बीजेपी उस वक्त से लेकर अब तक लगभग अजेय बनी हुई है। बीजेपी ने चुनावी सियासत में ये दांव तो खेला ही। साथ ही साथ विकास के एजेंडे को भी धार दी जिसका फायदा भी उसे मिला। नतीजा ये हुआ कि राजनीतिक इफ्तार पार्टियां लगभग बंद हो गई हैं, हर नेता खुद को अधिक ज्यादा सनातनी दिखाने की कोशिश में लग गया है। राहुल गांधी को अपना गोत्र याद आने लगा है। दूसरे विपक्षी नेता मंदिरों में दिखने लगे, कर्मकांड करने लगे हैं।
यानी बीजेपी के हिंदुत्व वाले एजेंडे की काट तलाशने के तमाम जतन हुए। लेकिन सब फेल। वो इसलिए क्योंकि बीजेपी ने हिंदुत्व की सियासत को शुरुआत से ही नहीं छोड़ा। जबकि विपक्षी नेताओं की विचारधारा चुनावी हिसाब से बनती बिगड़ती रही। ऐसे में विश्वसनीयता की कसौटी पर विपक्ष की कोशिश कभी परवान नहीं चढ़ पाई
विपक्ष ने फिर हिंदुत्व की काट के लिए जातीय जनगणना का मुद्दा उठाया, बिहार में सीएम नीतीश कुमार ने तो सर्वे कराकर रिपोर्ट भी दे दी है, लेकिन वहीं बदले में बीजेपी ने हिंदुत्व के एजेंडे को और धार दे दी है। अयोध्या में रिकॉर्ड तोड़ दीपोत्सव कर और माहौल बना दिया है। इतना ही नहीं राम मंदिर के उदघाटन के जरिए चुनाव से ठीक पहले और ज्यादा माहौल बनाने की कोशिश है।यानी विपक्ष के हर वार का पलटवार बीजेपी के पास पहले से तैयार है। जिसका विपक्ष के पास फिलहाल कोई जवाब नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विपक्ष चुनाव पहले ही ये मान चुका है कि वो फिलहाल बीजेपी से मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है?क्या इसीलिए विपक्ष के नेता अपने पुराने तुष्टिकरण के एजेंडे पर वापस लौट रहे हैं? क्या इसके जरिए विपक्ष की कोशिश किसी भी तरह अपने कोर वोट-बैंक को बचाए रखने की है?क्या बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे की काट के तौर पर तुष्टिकरण करने वाले बयान दिए जा रहे? असल में विपक्ष खासकर समाजवादी पार्टी ने स्वामी प्रसाद मौर्य को सियासी प्रयोगशाला बना कर रखा है। शायद यही वजह है कि मौर्या चाहे जितना भी पानी पी पीकर सनातन को कोसते हैं सपा के शीर्ष नेता चुप रहते हैं। इतना ही नहीं उन्हें पर्दे के पीछे शह भी देते हैं। सवाल उठता है कि ऐसे दौर में जबकि सनातन के खिलाफ बोलना राजनीतिक खुदकुशी जैसा है। मौर्या के बयानों पर सपा की चुप्पी का मतलब क्या है। ये भी ध्यान रखिए कि ये वही सपा है जो यूपी में विपक्षी एकता की धज्जियां उडाने को भी तैयार है। अब तय आपको करना है कि मौर्या के बयान महज़ संयोग है या फिर सपा का कोई बड़ा सियासी प्रयोग।