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लक्ष्मण मंदिर: सिर्फ ताजमहल ही नही, इस जगह को भी कहते हैं मोहब्बत की निशानी!

नई दिल्ली: जब भी बात मोहब्बत के मिसाल की होती है तो ताजमहल सबसे पहले हमारे जहन में आता है। लेकिन क्या आप को पता है हमारे ही देश में प्यार की एक ऐसी भी मिसाल है जो ताजमहल से भी 1100 साल पहले बनवाई गई थी और आज भी वो हमारे बीच मौजूद है। ऐसा ही एक मंदिर है जो श्रीपुर में स्थित है और उसे लक्ष्मण मंदिर (Lakshman Mandir) कहा जाता है।

हीर-रान्झा और लैला-मजनू के प्यार के किस्से तो आम है। शाहजहां ने भी मुमताज के याद मे ताजमहल बनवा दिया था। लेकिन प्यार की एक ऐसी भी निशानी है जिसे इतिहास ने शायद इतना याद नहीं किया था। यही वजह रही है कि ये इतना पॉपुलर नहीं हुआ था। कहा जाता है कि छठी शताब्दी में श्रीपुर एक आधुनिक राजधानी थी। वही श्रीपुर आज सिरपुर के नाम से जानी जाती है।

क्या है पीछे की कहानी?

यहां के राजा हर्षगुप्त हुआ करते थे। उनका विवाह मगध नरेश सूर्यवर्मा की बेटी वासटादेवी से हुआ था। दोनों एक दुसरे से इतना प्यार करते थे कि हर्षगुप्त की मौत के बाद रानी ने उनकी याद में एक मंदिर भी बनवाया था। कहा जाता है कि 14वीं-15वीं सदी में महानदी की विकराल बाढ़ में यह नगरी पूरी तरह तबाह हो गई थी। मगर, इस त्रासदी के बाद भी ये मंदिर प्यार की अमर निशानी के रूप में खड़ा रहा था। इसे आज लक्ष्मण मंदिर (Lakshman Mandir) के नाम से जाना जाता है।

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ये मंदिर ताजमहल से 1100 साल पहले बनवाया गया था। ये एक मंदिर ही नही बल्कि बेपनाह प्यार का जीता-जागता उदाहरण भी है। चीन से भारत यात्रा पर आए व्हेनसांग ने अपनी यात्रा के बारे मे लिखते हुए सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर का उल्लेख भी किया था। व्हेनसांग छठी शताब्दी में भारत आये थे। जिसके आधार पर तीन साल पहले शुरू हुई खुदाई में मिले अवशेषों और शिलालेखों से पता चला कि ये मंदिर 635-640 ईस्वी में बनाया गया था। इन्हीं शिलालेखों में ही वासटादेवी और हर्षवर्धन की प्रेम कहनी के सबूत मिलते हैं।

भले ही इसे लक्ष्मण मंदिर (Lakshman Mandir) कहा जाता है लेकिन ये वासटादेवी और हर्षवर्धन की अमर प्रेम गाथा की ही निशानी है। ताजमहल और लक्ष्मण मंदिर में फर्क बस इतना है कि ताजमहल का निर्माण बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज की याद में करवाया था और लक्ष्मण मंदिर का निर्माण रानी वासटादेवी ने अपने पति महाराज हर्षगुप्त की याद में करवाया। चूंकि इसका निर्माण एक शासक ने नहीं करवाया इसलिए ये ताजमहल के जितना भव्य नहीं है, लेकिन इसकी हर एक-एक ईंट आज भी मोहब्बत की दास्तां बयां करती है।

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